आसींद । आसींद तहसील का मोतीपुर गांव आज आत्मनिर्भरता का एक शानदार उदाहरण बनकर उभरा है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-इजरायल युद्ध जैसे हालातों के चलते रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है और सिलेंडरों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर मोतीपुर के ग्रामीणों ने इस संकट का देसी समाधान निकाल लिया है। गांव में गोबर गैस (बायोगैस) प्लांट लगाकर लोगों ने न केवल गैस की समस्या से राहत पाई है, बल्कि महंगाई से भी खुद को काफी हद तक बचा लिया है। करीब चार साल पहले शुरू हुई इस पहल ने आज पूरे गांव की तस्वीर बदल दी है। लगभग 200 घरों वाले इस गांव में 120 से अधिक परिवारों ने अपने घरों में गोबर गैस प्लांट स्थापित कर लिए हैं। इतना ही नहीं, कई प्लांट धारकों ने अपने पड़ोसी दो से तीन घरों तक भी गैस कनेक्शन दे रखा है, जिससे सामूहिक लाभ का मॉडल भी सामने आया है। ग्रामीण छोटू लाल जाट बताते हैं कि यह पूरी व्यवस्था देसी तकनीक पर आधारित है। इसमें गाय-भैंस के गोबर का उपयोग कर बायोगैस तैयार की जाती है। इस गैस से रसोई का चूल्हा आसानी से जलता है, जिससे सिलेंडर की जरूरत खत्म हो गई है। अब ग्रामीणों को न तो गैस खत्म होने की चिंता रहती है और न ही बढ़ती कीमतों का डर।
गोबर गैस प्लांट एक सरल लेकिन प्रभावी तकनीक है, जिसमें प्रतिदिन लगभग 12 से 13 किलो गोबर में पानी मिलाकर घोल तैयार किया जाता है। इस मिश्रण को प्लांट के टैंक में डाला जाता है, जहां जैविक अपघटन की प्रक्रिया से मीथेन गैस उत्पन्न होती है। यही गैस पाइपलाइन के माध्यम से सीधे रसोई तक पहुंचती है और चूल्हे जलाने में काम आती है। खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी बिजली,रसायन या भारी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होती। इस प्लांट से निकलने वाला अवशेष ‘स्लरी’ खेतों के लिए बेहद उपयोगी जैविक खाद के रूप में काम करता है। कई ग्रामीण इसे बेचकर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रहे हैं। इससे खेती की लागत घट रही है और उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है। ग्रामीणों का मानना है कि गोबर गैस के उपयोग से प्रदूषण कम होता है और रसोई में धुआं नहीं होने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ा है। साथ ही, जैविक खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हुई है, जिससे जमीन की उर्वरता भी बनी हुई है। मोतीपुर गांव आज न सिर्फ गैस संकट के दौर में आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है, बल्कि अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन रहा है। यहां के लोग अब इसे एक स्थायी और सस्ती ऊर्जा के रूप में अपनाकर भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। कुल मिलाकर, मोतीपुर गांव ने यह साबित कर दिया है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो ग्रामीण स्तर पर भी बड़े संकटों का समाधान निकाला जा सकता है। गोबर गैस के जरिए यह गांव न केवल आत्मनिर्भर बना है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी एक मिसाल पेश कर रहा है। आसींद से रोहित सोनी की रिपोर्ट
