पान का बीड़ा,चश्मा काला…. ‘बाउजी’ के बड़े सपने 

पान का बीड़ा,चश्मा काला…. ‘बाउजी’ के बड़े सपने

 

चित्तौड़गढ़ । स्मार्ट हलचल।चुनावी समर का आख़िरी दौर है, सुरख़ियां उरूज पर हैं और हर गली, हर नुक्कड़ पर बस एक ही हुंकार है ‘मांग मनुहार’ ! शहर के 60 वार्डों में चुनावी सरगर्मी अपनी पूरी रंगत में आ चुकी है। कहीं भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिल रहा है, तो कई जगह त्रिकोणीय मुकाबले का ऐसा पेंच फंसा है कि महारथियों के पसीने छूट रहे हैं। अपनी नाव पार लगाने के लिए हर उम्मीदवार एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है, व्यक्तिगत संपर्क और मनुहार का दौर अपनी पूरी शिद्दत से जारी है।

इसी सियासी हुड़दंग के बीच एक वार्ड की कहानी सबसे दिलकश बनी हुई है जहां ‘पान वाले बाउजी’ की अपनी ही अलग ठसक है ! मुंह में दबा बनारसी बीड़ा, चेहरे पर चढ़ा वज़नदार काला चश्मा और एक खास रौब । बाउजी के इस आभामंडल के आगे किसी औपचारिकता की जगह ही नहीं बचती। यहां का मंजर भी दिलचस्प है, प्रत्याशी जी को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ रही, मतदाता खुद ही उनके लिए ‘कारसेवा’ में जुट गए हैं । बाउजी का पान का बीड़ा और काला चश्मा कभी नहीं उतरता, लेकिन इस बेफ़िक्र अंदाज़ के पीछे बड़े-बड़े सपनों का जो ताना-बाना बुना जा रहा है, उसकी चर्चा पूरे शहर की जुबान पर है। मतदाता भी अब कम चतुर नहीं हैं ! शहर के विकास, नई बनी सड़कों और पुलियों के पन्नों को टटोला जाए, तो उजरदारियां (आपत्तियां) अपने-आप सच बयान करने लगती हैं। सड़कों के मुहाने पर निकली इन उजरदारियों में जिन जमीनों के मालिकों के नाम दर्ज हैं, वे किसके ‘खास आदमी’ हैं ? यह रहस्य तो अब जगजाहिर सा होने लगा है । खैर, यह तो लोकतंत्र की वो रवायत है जहां आरोप-प्रत्यारोप के बिना कोई चुनाव पूरा नहीं होता। लेकिन इस बार जनता के तीखे सवालों ने दिग्गज नेताओं की नींद जरूर उड़ा दी है । तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सपने सिर्फ आचार संहिता के दायरे में रहकर ही नहीं देखे जाते, कुछ सपने ‘मनोनयन’ की राह से भी सच होते हैं! अब देखना यह बाकी है कि इस दिलचस्प मुकाबले में जनता अपने वोटों की मिठास से ‘पान वाले बाउजी’ का सपना पूरा करती है, या फिर उन्हें मनोनयन का रास्ता तलाशना पड़ता है । फैसला मतदाता की उंगली पर लगी स्याही के हाथ में है !