मांडल । सुरेश चंद्र मेघवंशी
भीलवाड़ा जिले के मांडल कस्बे की 400 साल से अधिक पुरानी ऐतिहासिक परंपरा नाहर नृत्य इस वर्ष भव्य रूप में मांडल महोत्सव के रूप में आयोजित की जाएगी। मंगलवार शाम को मांडल के शेषसहाय मंदिर के सामने नाहर नृत्य की प्रस्तुति होगी, बाद में रात्रि 8 बजे मांडल के स्टेडियम में प्रस्तुति होगी। बताया जाता है कि इस नृत्य की शुरुआत मुगल बादशाह शाहजहां के मनोरंजन के लिए करीब 412 वर्ष पहले हुई थी, जो आज भी निरंतर परंपरा के रूप में जीवित है।
राजस्थान के मेवाड़ का प्रवेश द्वार कहलाने वाला भीलवाड़ा अपनी अनोखी लोक परंपराओं और रीति-रिवाजों के कारण विशेष पहचान रखता है। मलखंभ पूजा, वैशाख नंदन गधों की पूजा, शीतला सप्तमी पर जीवित व्यक्ति की अर्थी निकालने जैसी परंपराओं के बीच मांडल का नाहर नृत्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
400 साल से जीवित है नाहर नृत्य की परंपरा
मांडल में यह नृत्य वर्ष में केवल एक बार आयोजित होता है। मान्यता है कि वर्ष 1614 में जब मुगल सम्राट शाहजहां उदयपुर जाते समय मांडल में रुके थे, तब स्थानीय लोगों ने नरसिंह अवतार का स्वांग प्रस्तुत किया था, जिससे बादशाह अत्यंत प्रभावित हुए। तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। यह नृत्य धार्मिक परंपरा के अनुसार पहले “राम” और फिर “राज” के सामने प्रस्तुत किया जाता है, जो इसकी विशिष्ट पहचान है।
मांडल महोत्सव के रूप में होगा आयोजन
मांडल विधायक उदय लाल भड़ाना ने बताया कि पारंपरिक नाहर महोत्सव को इस बार प्रशासनिक सहयोग से मांडल महोत्सव के रूप में भव्य स्तर पर आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम मांडल के स्टेडियम में आयोजित होगा, महोत्सव में भाजपा नेता सहित कई जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन के अधिकारी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु व दर्शक शामिल होंगे।
दीपावली से भी बड़ा पर्व
स्थानीय नागरिकों के अनुसार मांडल महोत्सव कस्बे के लिए दीपावली से भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन घर-घर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं और रिश्तेदारों, बेटियों-दामादों व मेहमानों को आमंत्रित कर “अतिथि देवो भवः” की परंपरा निभाई जाती है।
ऐसे रचा जाता है नरसिंह (नाहर) का स्वांग
नाहर नृत्य करने वाले कलाकार वर्षों से पारंपरिक शैली में प्रस्तुति देते आ रहे हैं। कलाकार अपने शरीर पर लगभग 4 किलो रुई सुतली से लपेटकर नरसिंह (शेर) का रूप धारण करते हैं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों व धड़ूक की धुन पर नृत्य करते हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों द्वारा निभाई जा रही है।
भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
होली के 13 दिन बाद रंग तेरस पर आयोजित होने वाला यह महोत्सव आपसी भाईचारे, लोक आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है। सुबह से रंग-गुलाल खेला जाता है और दिन में बादशाह-बेगम की पारंपरिक सवारी भी निकाली जाती है। मांडल महोत्सव न केवल एक उत्सव, बल्कि 400 वर्षों से जीवित लोक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत उदाहरण है।
