भैरू चौधरी
भीलवाड़ा। एक समय था जब जहाजपुर, शाहपुरा, कोटड़ी, मांडल, सांगानेर और लुहारिया कला जैसे कस्बे साम्प्रदायिक तनाव और लगातार बंद के कारण भय के साये में जी रहे थे। ऐसे हालात में सरकार ने जिला पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह यादव को जिम्मेदारी सौंपी। एसपी यादव ने सख्ती और संतुलन के साथ हालात को काबू में किया, कानून व्यवस्था को पटरी पर लाया और आमजन का भरोसा जीता। उनकी कार्यशैली ने यह साबित किया कि इच्छाशक्ति हो तो हालात बदले जा सकते हैं।लेकिन इसी भरोसे के बीच अब एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस DST (डिस्ट्रिक्ट स्पेशल टीम) को अपराध पर लगाम कसने के लिए बनाया गया था, उसी के नाम पर वसूली का खेल चलने के आरोप सामने आए हैं। कार्रवाई के नाम पर बनी यह टीम धीरे-धीरे “उगाही” का पर्याय बनती नजर आई और अब गारनेट माफिया से जुड़ा मामला इस पूरे घटनाक्रम को और गहराई दे रहा है।कोटड़ी, पारोली, बीगोद और बडलियास क्षेत्र से सामने आए अवैध गारनेट खनन और “बंदी” वसूली के इस प्रकरण ने एक संगठित नेटवर्क की तस्वीर उजागर कर दी है। मामला अब सिर्फ एक FIR तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसे “कलेक्शन मॉडल” की ओर इशारा करता है, जो कहीं न कहीं अंग्रेजों के दौर की ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ जैसी व्यवस्था की याद दिलाता है—जहां तय होता था कि कौन काम करेगा और किससे कितना वसूला जाएगा।एफआईआर के अनुसार अजय पांचाल, नंदसिंह उर्फ पिन्टू सिंह, नारायण गुर्जर और कालू गुर्जर ने मिलकर गिरोह बनाकर गारनेट कारोबारियों को डरा-धमकाकर प्रति मशीन ₹30-30 हजार मासिक “बंदी” देने को मजबूर किया। इसके अलावा शंकर लाल गुर्जर, राजू वैष्णव, चैन सिंह, सोहन जाट, धन्ना लाल गुर्जर, विजय गुर्जर, रामचन्द्र गुर्जर, देवकिशन गुर्जर, छोटू लाल गुर्जर सहित 15–20 अन्य लोगों से वसूली का जिक्र यह स्पष्ट करता है कि यह नेटवर्क गहराई तक फैला हुआ था और संगठित तरीके से संचालित हो रहा था।इस पूरे घटनाक्रम की सबसे गंभीर कड़ी यह है कि FIR में ही इस नेटवर्क की जानकारी बीट कांस्टेबल और आसूचना तंत्र के माध्यम से सामने आने और मुखबिर से पुष्टि होने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्थानीय पुलिस तंत्र—थाना अधिकारी, बीट प्रभारी और खुफिया इकाइयां—इस पूरे “बंदी राज” से पूरी तरह अनजान थीं, या फिर कहीं न कहीं उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में आती है?जैसे ही मामला जिला पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह यादव तक पहुंचा, उन्होंने तत्काल संज्ञान लेते हुए विशेष टीम को सक्रिय किया और मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार करवाया। यह कार्रवाई यह दिखाती है कि शीर्ष स्तर पर इच्छाशक्ति हो तो माफिया तंत्र पर प्रभावी प्रहार संभव है।हालांकि, मामला नया मोड़ तब लेता है जब DST प्रभारी आईपीएस माधव उपाध्याय की भूमिका पर भी सवाल उठने लगते हैं। इसके बाद एसपी द्वारा जांच बैठाना इस ओर संकेत करता है कि मामला अब केवल माफिया या दलालों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सिस्टम के भीतर तक जा सकती हैं।अब यह प्रकरण केवल अवैध खनन या वसूली का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और पुलिस तंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है—क्या यह पूरा “बंदी सिस्टम” एक संगठित लूट मॉडल बन चुका था, जहां नीचे से लेकर ऊपर तक हिस्सेदारी तय थी? क्या कोई बड़ा चेहरा अब भी पर्दे के पीछे सक्रिय है? और क्या चल रही जांच इस पूरे नेटवर्क का खुलासा कर पाएगी, या फिर कुछ नाम सामने आने के बाद बाकी परतें फिर से दबा दी जाएंगी?
भीलवाड़ा की जनता अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे सच का इंतजार कर रही है—क्योंकि सवाल सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि भरोसे का है।
