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भाजपा की नई रणनीति के बाद मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान व राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया का क्या होगा ?BJP’s new strategy politics

BJP’s new strategy politics

अशोक भाटिया,

स्मार्ट हलचल/मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों की तारीखों के ऐलान से पहले ही भाजपा ने 78 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह खलबली मचा दी है। भाजपा ने मध्य प्रदेश के चुनावी रण में अब तक तीन केंद्रीय मंत्री और 4 सांसदों को उतारा है। ऐसे में अब पूरी उम्मीद है कि राजस्थान में भी भाजपा इसी फार्मूले पर काम करेगी और राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियों की मुताबिक़ क्षेत्रीय नेताओं, जिनकी अपने समाज में पकड़ है उनको आगे लाया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक राजस्थान में 4 से 5 सांसदो को चुनाव लड़ाने की तैयारी भी की जा रही है।
राजस्थान विधानसभा चुनावों की रणनीति पर भाजपा आज जयपुर में बैठक कर रही है। बैठक में गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल सन्तोष भी मौजूद रहे। इन नेताओं के साथ ही वसुंधरा राजे सिंधिया, गजेन्द्र सिंह शेखावत, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, राजेंद्र राठौड़, अरुण सिंह, सतीश पूनिया और सह प्रभारी नितिन पटेल मौजूद हैं। बैठक में परिवर्तन यात्रा के बाद राज्य में भाजपा को लेकर माहौल पर चर्चा हो रही है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा , मध्य प्रदेश का फॉर्मूला राजस्थान में अपनाएगी।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों में तारीखों का ऐलान भले ही अभी तक नहीं हुआ है लेकिन भाजपा उम्मीदवारों की घोषणा करने लगी है। मंगलवार को भाजपा के राजस्थान चुनाव प्रभारी केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा था कि भाजपा जल्द ही राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की घोषणा करेगी।
सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल समेत कुछ अन्य सांसदों को भी विधानसभा चुनाव में उतारा जा सकता है। इस बैठक में टिकट वितरण और अन्य चुनाव संबंधी मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। साथ ही परिवर्तन यात्रा से मिली प्रतिक्रिया पर भी चर्चा करेंगे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि गुरुवार सुबह, नड्डा और शाह आरएसएस के स्थानीय नेताओं से मुलाकात करेंगे।भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष भी जयपुर में हैं।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश चुनावों के लिए भाजपा ने अपनी दूसरी लिस्ट जब जारी की, तो उसमें कई केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों का नाम देखकर सबको हैरत हुई।कुछ अख़बारों की ख़बर के अनुसार इस लिस्ट के आने से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक भविष्य डगमगाया है।अख़बार भाजपा से जुड़े नेता के हवाले से लिखता है कि इस लिस्ट के ज़रिए मोदी के दौर से पहले की एक और भाजपा नेता वसुंधरा राजे को भी संकेत चले गए हैं। वसुंधरा राजस्थान की मुख्यमंत्री रही हैं और आगामी विधानसभा चुनावों में एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर निगाह लगाए हुई हैं।भाजपा ने मध्यप्रदेश चुनावों की दूसरी लिस्ट में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर समेत चार सांसदों को विधायकी का टिकट दिया है।मंगलवार से ये भी अटकलें भी लगाई जा रही थीं कि भाजपा शिवराज सिंह चौहान का टिकट काट सकती है। अब तक भाजपा ने जो दो लिस्ट जारी की हैं, उसमें शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं है।
वैसे भी भाजपा का मौजूदा शीर्ष नेतृत्व चौंकाने वाले फ़ैसलों के लिए जाना जाता रहा है।पार्टी से जुड़े एक नेता ने कहा कि शिवराज सिंह का टिकट कटने से जुड़ी संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।वो यह भी कहते हैं कि इस बात की संभावना कम ही है कि शिवराज सिंह चौहान चुनावी मैदान में ना हों पर इस बात को पुख़्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अगर भाजपा जीतती है तो वो मुख्यमंत्री बने रहेंगे। एक नेता का कहना है कि चुनावी नतीजों के बाद केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा?भाजपा नेताओं का कहना है कि नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद सिंह पटेल और महासचिव कैलाश विजयवर्गीय मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं और इन नेताओं को चुनावी मैदान में उतारकर भाजपा ने अगले मुख्यमंत्री की संभावनाओं को और विस्तार दे दिया है।
राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में है। राजस्थान में हर पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए भाजपा चुनौती है। भाजपा से जुड़े एक नेता ने बताया कि मध्य प्रदेश जैसे हालात राजस्थान में भी हो सकते हैं।शिवराज सिंह चौहान चार बार से मुख्यमंत्री हैं और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी दो दशक से राजस्थान में भाजपा की बड़ी नेता हैं लेकिन मौजूदा नेतृत्व चाहता है कि उनका प्रभुत्व ख़त्म हो।भाजपा ने राजस्थान में भी मुख्यमंत्री चेहरे का एलान नहीं किया है और पार्टी राजस्थान में भी ऐसा ही कर सकती है।अख़बार लिखता है कि राजस्थान में भी भाजपा अपने अहम नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों को चुनावी मैदान में उतार सकती है।
कुछ पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा जो तरीका अपना रही है, उससे गुटबाज़ी बढ़ सकती है और इसका नुकसान पार्टी को ही होगा। दोनों राज्यों में भाजपा के अंदर भी हालात पहले से ही बहुत अच्छे नहीं हैं।
एक पार्टी नेता का कहना है कि ‘मौजूदा नेतृत्व की दुविधा ये है कि वो शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे को नहीं चाहते हैं लेकिन वो उन्हें नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकते। दोनों की नेताओं के पास काफ़ी समर्थन है।
दरअसल देखा जाय तो 64 वर्षीय शिवराज सिंह चौहान 2005 में भारी उठापटक के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। उनके नाम पर प्रमोद महाजन ने उस वक्त वीटो लगाया था। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज ने भाजपा की राजनीति की दिशा ही बदल दी।2008 में शिवराज के नेतृत्व में दूसरी बार भाजपा मध्य प्रदेश की सत्ता में आई। इसके बाद दिल्ली और नागपुर तक उनका दखल बढ़ा। मध्य प्रदेश भाजपा खासकर संघ की राजनीतिक प्रयोगशाला है। यहां पहली बार जनसंघ ने 1977 में सरकार बनाई थी। संघ का फायदा शिवराज ने भी खूब उठाया और भाजपा में अपने समकक्ष के नेताओं को दिल्ली भेजने में कामयाब रहे। पहले प्रभात झा फिर नरेंद्र तोमर और बाद में कैलाश विजयवर्गीय शिवराज की वजह से दिल्ली की राजनीति करने लगे।
हालांकि, 2018 में भाजपा की हार ने शिवराज के वजूद पर जरूर असर डाला, लेकिन जल्द ही शिवराज फिर से एक्टिव हो गए। 2020 में कथित ऑपरेशन लोटस के बाद शिवराज सिंह चौहान फिर से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। कर्नाटक हार के बाद शिवराज का एक बयान खूब सुर्खियों में था। उन्होंने भाजपा नेताओं से कहा था कि यहां शिवराज है, कर्नाटक-फर्नाटक की बात भूल जाओ। हालांकि, चुनाव नजदीक आने के बाद भाजपा हाईकमान ने जिस तरह से फैसले लिए हैं, उससे शिवराज के भविष्य पर सस्पेंस बढ़ गया है।
राजस्थान की बात करें तो भैरो सिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के बाद राजस्थान में भाजपा की सियासत वसुंधरा राजे के इर्द-गिर्द घूमने लगी। भाजपा को सत्ता में लाकर वसुंधरा 2 बार मुख्यमंत्री भी बनीं। 2013 में वसुंधरा को सत्ता में लाने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी। हालांकि, 2018 के बाद भाजपा की अंदरूनी राजनीति 360 डिग्री यू-टर्न ली। 2018 में पार्टी के भीतर ही ‘मोदी तुझसे बैर नहीं पर वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ का नारा जोर-शोर से उठा, जो धीरे-धीरे पूरे राजस्थान में छा गया।2018 में हार के बाद वसुंधरा को भाजपा ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। हालांकि, वसुंधरा को किसी राज्य का प्रभार नहीं दिया गया। राजस्थान चुनाव से पहले वसुंधरा के समर्थकों को यह उम्मीद थी कि उन्हें बड़ा पद मिलेगा, लेकिन अब ऐसा नहीं हुआ है।राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक रैली के दौरान कार्यकर्ताओं से सिर्फ कमल के फूल को ध्यान में रखने की सलाह दी थी। जानकारों का कहना है कि राजस्थान में ऊहापोह की स्थिति ने वसुंधरा की राजनीति को संकट में डाल दिया है।
अशोक भाटिया,

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