(अंजनी सक्सेना)
स्मार्ट हलचल|कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, जी जाती हैं। कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, हमारे भीतर धीरे-धीरे आकार लेती हैं। शिखा वार्ष्णेय का पहला उपन्यास ‘अस्मि’ ठीक वैसी ही किताब है। जैसे लेखिका ने भूमिका में लिखा है “हर यात्रा बाहर की नहीं होती, कुछ यात्राएँ हमें स्वयं तक ले जाती हैं।” यह उपन्यास उसी स्वयं तक पहुँचने की यात्रा है।
कौन है एला?
एला को देखते ही उसके पापा बोले थे – “अरे, यह तो एकदम अंग्रेज़ लगती है।” दूध सा रंग, भूरे मुलायम बाल। इसलिए नाम रखा एला। पूरे स्कूल की जान, पूरे खानदान की शान। हुनरमंद, रचनात्मक, जो देखती झट सीख लेती। पर हमारे यहां तो ज्यादा हुनरमंद लड़कियों को ही सबसे पहले कहा जाता है कि कोई बात नहीं बड़े लोग हैं, अपने मन का काम तुम वहाँ कर पाओगी।” और एला का विवाह एक पढ़े-लिखे, पैसे वाले घर में कर दिया गया। उसने भी तन-मन से झोंक दिया खुद को पति और बेटे में। खुद को क्या चाहिए, यह सोचने का न समय मिला, न रिवाज था।
जी,हां यही तो कहानी है न हम सबकी? कितनी एलाएं हमारे आसपास हैं जो अपने रंग-ब्रश,कागज पेन या सुर ताल को किचन की अलमारी में बंद करके बैठी हैं?
फिर एक दिन…
एला एक दुर्घटना में जंगल में पेड़ पर अटकती है। परिवार उसे ढूंढता है, नहीं मिलती। मान लिया जाता है कि मर गई, किसी जानवर ने खा लिया होगा और सब अपना-अपना जीवन जीने लगते हैं। पति राजीव क्लब जाने लगता है, बेटा अंकुर हॉस्टल चला जाता है।
“ओह! मरा ही मान लिया! क्या इतना कम फर्क पड़ता है उसके होने न होने से?”
यह पंक्ति पढ़ते हुए कलेजा चुभता है पर वर्तमान परिदृश्य में यह बेहद ही स्वाभाविक लगता है। और यहीं से शुरू होती है एला की दूसरी जिंदगी। गाँव वालों ने,उस घर की मालकिन ने उसका मल-मूत्र तक साफ किया है। तीन दिन तक उसे होश नहीं था। क्या लगते थे ये लोग उसके? कोई भी नहीं।
गाँव और दूसरी जिंदगी
यही गाँव,जहाँ गीत्तू की माँ आठवीं तक पढ़ी है, जो उस गाँव के हिसाब से बहुत बड़ी बात है। जहाँ लड़के भी हाईस्कूल फेल हैं। एला वहाँ बच्चों को पढ़ाती है, अंग्रेजी और गणित। सुबह घर के काम निपटाकर अपने रंग-ब्रश लेकर निकल जाती है और फिर जैसे जादू होता है।
उसने उस गाँव के लगभग हर घर की एक दीवार तो सजा ही दी थी। किसी के दरवाजे के सहारे बेल, तो किसी की दीवार पर कोई कहानी। किसी बच्चे वाले घर में हाथी-घोड़े, तो किसी की दीवार पर पौराणिक कथा का चित्र। गाँव के घर अब इतने सुन्दर लगने लगे कि वहाँ से गुजरने वाले लोग रुक-रुक कर फोटो लेने लगे।
वाह! क्या खूबसूरत दृश्य है। एक स्त्री जो अपने घर में दीवारों के भीतर कैद थी, आज पूरे गाँव की दीवारों को रंग रही है।
उपन्यास में रिओ का पत्र भी बहुत कुछ कहता है। रिओ इंग्लैंड में है। वहाँ न माता-पिता, न शिक्षक, कोई बाध्य नहीं करता। बच्चों के विचारों का सम्मान होता है। सरकार स्टडी लोन देती है, जो तब तक नहीं चुकाना जब तक कमाने न लगो। और वह भी उतना ही, जितनी आमदनी होगी। और अपने यहाँ? यहाँ एला जैसी लड़कियों को कहा जाता है-शादी के बाद कर लेना अपने मन का। यह तुलना भीतर तक हिला देती है।
आजकल के बच्चों को भले ही हम जेन जी और जेन अल्फा कह कर उनकी संवेदनशील को कम आंकते हैं लेकिन ये बच्चे बेहद ही संवेदनशील हैं। ऐसे में बेटा अंकुर भले ही होस्टल चला गया हो पर उसका मन भी अपनी मां के लिए तड़पता है। वह रील्स और वीडियो में मॉं को खोजता है फिर टैक्सी लेकर आता है और कहता है, “चलो माँ, घर चलो।” एला उसका हाथ थामकर कहती है – “बेटा, इन लोगों ने न जाने कितने दिन मेरी देखभाल की है,मेरा मल-मूत्र तक साफ किया है। क्या लगते थे ये लोग मेरे? कुछ भी नहीं। अंकुर, इस गाँव ने मुझे दूसरी जिंदगी दी है और अब मैं भी इनके लिए कुछ करना चाहती हूँ।”
बस,यही तो ‘अस्मि’ है, मैं हूँ, मैं सिर्फ किसी की पत्नी, किसी की माँ नहीं, मैं मैं भी हूँ।
क्यों पढ़नी चाहिए यह किताब?
क्योंकि यह उपन्यास कोई निष्कर्ष नहीं देता। यह सवालों के साथ चलता है। पहचान क्या है? होना क्या है? भीतर का सृजन क्या है? शिखा जी ने बहुत शोर नहीं मचाया। बहुत भारी-भरकम नारीवाद नहीं। बस काली चाय, बिस्कुट की प्लेट, गीत्तू का बातों का पिटारा,कैजा के पास बैठना,इन छोटे-छोटे दृश्यों से एक बड़ा संसार रच दिया।
शिवना प्रकाशन, सीहोर ने इसे ₹250 में, 120 पृष्ठ में बड़े सलीके से छापा है। कवर चित्र सौम्या वार्ष्णेय का है।
मेरी तरफ से इस किताब को 5 में से 4 स्टार। आधा स्टार इसलिए काटा कि मन कर रहा था, गाँव की और कहानियाँ और दीवारें और चित्रों के बारे में और पढ़ती। दूसरा आधा स्टार इसलिए कि जागृति और रियो की कहानी की भी इस उपन्यास में अधिक आवश्यकता नहीं थी। तो यदि आपने भी कभी अपने भीतर की किसी आवाज को अनसुना किया है, तो यह किताब आपके लिए है। पढ़िए, और अपने भीतर की ‘अस्मि’ को पहचानिए।