चातुर्मास आत्मा को कर्मों के प्रवाह से निकालने वाला आध्यात्मिक रेस्क्यू अभियान : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

पुनित चपलोत
भीलवाड़ा // धर्म, पुण्य और संत- सान्निध्य मिलना सौभाग्य है, लेकिन पुरुषार्थ और साधना से ही मानव जीवन सार्थक बनता है। यह उद्बोधन शांतिभवन में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजनों की परंपरा नहीं, बल्कि संसार और कर्मों के प्रवाह में फंसी आत्मा को बाहर निकालने वाला आध्यात्मिक ‘रेस्क्यू अभियान’ है। इसका वास्तविक लाभ उसी व्यक्ति को मिलता है, जो जागरूक होकर संत-सान्निध्य, जिनवाणी और साधना के अवसर को स्वीकार करता है।
युवाचार्यश्री ने एक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि पहाड़ी क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा होने से एक गांव में बाढ़ आ गई। जलस्तर बढ़ने पर ग्रामीण सुरक्षित स्थानों की ओर जाने लगे, लेकिन एक व्यक्ति यह कहते हुए अपने घर में रुका रहा कि उसे बचाने स्वयं भगवान आएंगे। पहले पड़ोसियों ने उसे साथ चलने के लिए कहा, फिर राहतकर्मी नाव लेकर पहुंचे और अंत में हेलीकॉप्टर से उसे बचाने का प्रयास किया गया, लेकिन उसने प्रत्येक सहायता को अस्वीकार कर दिया। अंततः वह बाढ़ में बह गया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य भी कई बार भगवान की सहायता को पहचान नहीं पाता। पड़ोसियों, राहतकर्मियों, नाव और हेलीकॉप्टर के माध्यम से उसे बचाने का प्रयास हुआ, लेकिन वह चमत्कार की प्रतीक्षा करता रहा। इसी प्रकार चातुर्मास, संतों का सान्निध्य और जिनवाणी मनुष्य को कर्मों तथा अज्ञान से बाहर निकालने के लिए प्राप्त अवसर हैं। केवल यह सोच लेना कि चातुर्मास प्रतिवर्ष आता है, पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह है कि हम इस आध्यात्मिक बचाव अभियान में कितनी सक्रियता से सम्मिलित होते हैं।
युवाचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य पूर्व जन्मों से शुभ कर्मों और पुण्य की संपदा लेकर आता है तथा वर्तमान जीवन में धर्म, साधना और पुरुषार्थ से उसे और समृद्ध कर सकता है। भरत चक्रवर्ती इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्हें राजवैभव, अनुकूल परिस्थितियां और धर्म-साधना के व्यापक अवसर मिले, लेकिन वे भोगों के मध्य रहते हुए भी कमल की तरह निर्लिप्त रहे। उन्होंने उपलब्ध साधनों का उपयोग आत्मस्वरूप को पहचानने और कर्मों का क्षय करने में किया।
उन्होंने कहा कि धर्म, जिनशासन, जिनवाणी और साधु-संतों का समागम मिलना भी पूर्व पुण्य का परिणाम है। केवल अवसर मिल जाना पर्याप्त नहीं है, उसका सदुपयोग करना आवश्यक है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि कर्मों का बंधन केवल क्रिया से नहीं, बल्कि उसके पीछे की आसक्ति, अहंकार और प्रसन्नता से अधिक गहरा होता है। जब मनुष्य किसी को कष्ट देकर, अपमानित करके अथवा छलपूर्वक फंसाकर आनंद का अनुभव करता है, तब कर्मों की गांठ अधिक मजबूत और चिकनी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि साधारण गांठ खोलना आसान होता है, लेकिन अत्यधिक कसी और चिकनी गांठ खोलना कठिन हो जाता है। इसी प्रकार आसक्ति, राग-द्वेष और अहंकार से बांधे गए कर्म आत्मा के भव-भ्रमण को लंबा कर देते हैं। इसलिए प्रत्येक कार्य करते समय व्यक्ति को अपने भावों के प्रति सजग रहना चाहिए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य की महानता उसके जन्म, जाति, कुल, पंथ अथवा बाहरी पहचान से निर्धारित नहीं होती। उसका तप, आचरण, साधना और आत्मपुरुषार्थ ही उसकी वास्तविक शक्ति है। केवल किसी धर्म या संप्रदाय से जुड़े होने का दावा मोक्ष का अधिकार प्रदान नहीं करता।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति कई बार जिनशासन और आत्मकल्याण की चिंता करने के स्थान पर अपने पंथ, परंपरा अथवा संप्रदाय की श्रेष्ठता सिद्ध करने में उलझ जाता है। पंथ और परंपराएं तभी सार्थक हैं, जब वे भगवान महावीर के सिद्धांतों, अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि से जुड़ी रहें।
केवल यह कहना कि हम जैन हैं अथवा हमारी परंपरा श्रेष्ठ है, पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमारे जीवन में भगवान महावीर की करुणा, अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मजागरण कितना प्रकट हुआ है। दावा करने से नहीं, साधना करने से आत्मकल्याण का मार्ग खुलता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि धर्म केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। किसी साधार्मिक बंधु के जीवन में अभाव, संकट अथवा कठिनाई हो तो सक्षम व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह उसका सहयोग करे। सहयोग करना एहसान नहीं, बल्कि धर्म और मानवता का दायित्व है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय जीवन को संवारने का अवसर है। जो व्यक्ति वर्तमान अवसर का उपयोग नहीं कर पाता, वह भविष्य में मिलने वाले अवसर का सदुपयोग कर सकेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। धर्मसभा, संत-सान्निध्य, तप, स्वाध्याय और जिनवाणी आत्मा को जगाने वाले आंतरिक अलार्म तथा रेस्क्यू अभियान की तरह हैं।
युवाचार्यश्री ने कहा कि बाहरी अलार्म केवल आवाज करता है, लेकिन भीतर जागने की तैयारी न हो तो व्यक्ति फिर सो जाता है। जिसके भीतर आत्मकल्याण की तीव्र भावना जागृत हो जाती है, उसे थोड़ी-सी प्रेरणा भी साधना के मार्ग पर आगे बढ़ा देती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे चातुर्मास को सामान्य आयोजन न मानें। इसे आत्मचिंतन, कर्मनिर्जरा, तप, सेवा और सत्य को जीवन में धारण करने के अवसर के रूप में स्वीकार कर मानव जीवन को सार्थक बनाएं।
चातुर्मास समिति के संयोजक कंवरलाल सूरिया एवं मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि धर्मसभा में हितमितभाषी हितेंद्र ऋषिजी,उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी, यशो दीप्ति मधुकंवरजी,महासती सुचेताजी तथा साध्वी पियूषदर्शनाजी आदि का सान्निध्य रहा। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मचक्र तप की तपस्या के प्रत्याख्यान युवाचार्यश्री से ग्रहण किए।