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फोटो की राजनीति और गुटों की जंग: चित्तौड़गढ़ भाजपा में संगठन से पहले सत्ता की चिंता

फोटो की राजनीति और गुटों की जंग: चित्तौड़गढ़ भाजपा में संगठन से पहले सत्ता की चिंता

अनिल सुखवाल


चित्तौड़गढ़ भाजपा में पोस्टर राजनीति के ज़रिए अंदरूनी गुटबाजी अब खुलकर सामने आ चुकी है। संगठनात्मक असंतुलन इस कदर गहरा गया है कि नगर परिषद् और पंचायती राज चुनावों से पहले पार्टी की राह मुश्किल होती दिख रही है। बधाई बैनर अब महज़ औपचारिकता नहीं रहे, बल्कि समर्थन, निष्ठा और भविष्य की राजनीति के संकेत बन चुके हैं।

“बधाई बैनर में किस नेता का फोटो, कितना बड़ा और किसे हटाया जाए?”

जिले की राजनीति में इन दिनों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब बंद कमरों या संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं रह गई है। यह संघर्ष अब सड़कों पर लगे बधाई बैनर और पोस्टरों में साफ़ दिखाई देने लगा है।

पोस्टर नहीं, भविष्य की राजनीति का संकेत

पार्टी सूत्रों के अनुसार यह विवाद अब केवल प्रचार सामग्री तक सीमित नहीं है। बैनर-पोस्टर कार्यकर्ताओं के लिए यह तय करने का पैमाना बनते जा रहे हैं कि किस नेता या गुट से जुड़ना भविष्य के लिए सुरक्षित रहेगा। मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि एक गलत फोटो या किसी प्रभावशाली नेता की अनदेखी उनके राजनीतिक भविष्य पर भारी पड़ सकती है।

कार्यकर्ताओं में बढ़ती बेचैनी

जमीनी कार्यकर्ताओं का कहना है कि मेहनत बूथ स्तर पर होती है, लेकिन निर्णय सीमित दायरे में लिए जाते हैं। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:

“आज कार्यकर्ता पार्टी के हित से ज़्यादा यह सोचने को मजबूर है कि उसे किस गुट के साथ खड़ा दिखना चाहिए।”

‘हाथियों की लड़ाई में झाड़ियों का नाश’

गुटों के बीच वर्चस्व की इस लड़ाई में सबसे ज़्यादा नुकसान छोटे और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को उठाना पड़ रहा है। सत्ता की शतरंज पर चालें चल रहे जनप्रतिनिधि इस मानसिकता में दिखते हैं कि वज़ीर और राजा हर हाल में सुरक्षित रहने चाहिए, चाहे इसके लिए कार्यकर्ताओं की बलि ही क्यों न देनी पड़े।

टिकट वितरण और नेतृत्व की चुनौती

नगर परिषद् और पंचायती राज चुनावों में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कार्यकर्ताओं का एक वर्ग निष्क्रिय या तटस्थ हुआ, तो इसका सीधा फायदा कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिल सकता है।

विकास के दावे बनाम जमीनी हकीकत

  • योजनाओं का लाभ समान रूप से क्यों नहीं दिखता?
  • स्थानीय निकायों को वास्तविक अधिकार क्यों नहीं मिले?
  • जनता की रोजमर्रा की समस्याएं प्राथमिकता से बाहर क्यों रहीं?

निष्कर्ष: आत्ममंथन की ज़रूरत

चित्तौड़गढ़ से जयपुर और दिल्ली तक पहुंच रहे फीडबैक में संकेत स्पष्ट हैं कि संगठनात्मक अनुशासन कमजोर हो रहा है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही अंदरूनी एकजुटता है।

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