एजाज़ अहमद उस्मानी
स्मार्ट हलचल| लगभग दो वर्ष पूर्व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में क्रमोन्नत किए जाने के बावजूद मेड़ता रोड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार तो दूर, आज भी यह केंद्र जर्जर भवन और सीमित संसाधनों के सहारे ही संचालित हो रहा है।
सीएचसी का दर्जा मिलने के बाद जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति, जांच सुविधाओं का विस्तार और बेहतर आधारभूत ढांचे की उम्मीद थी, वहीं हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। केंद्र में न तो पर्याप्त जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं और न ही आधुनिक चिकित्सा उपकरण। मरीजों को सामान्य जांचों के लिए भी निजी लैब का सहारा लेना पड़ रहा है।
300 मरीजों की ओपीडी, लेकिन सुविधाएं नदारद
मेड़ता रोड सीएचसी में प्रतिदिन औसतन करीब 300 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं, जिनमें आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज भी शामिल हैं। इसके बावजूद यहां न तो आवश्यक जांचें नियमित रूप से हो पा रही हैं और न ही आपातकालीन सेवाओं का समुचित प्रबंध है। कई बार मरीजों को गंभीर स्थिति में नागौर या जोधपुर रेफर करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सीएचसी बनने के बाद केवल नाम बदला है, कामकाज और व्यवस्थाएं आज भी पीएचसी जैसी ही हैं। न तो भवन का विस्तार हुआ और न ही जर्जर संरचना की मरम्मत की गई।
जर्जर भवन बना खतरा, कंडम घोषित
स्वास्थ्य केंद्र का भवन काफी पुराना और क्षीण अवस्था में है। बरसात के मौसम में छत से पानी टपकने और दीवारों में दरारें आने की शिकायतें आम हैं। मरीजों और उनके परिजनों को असुविधा के साथ-साथ सुरक्षा का भी खतरा बना रहता है। उल्लेखनीय है कि मेड़ता उपखंड अधिकारी पूनम चोयल ने कुछ महीनों पूर्व निरीक्षण के दौरान इस भवन को कंडम घोषित कर दिया था, इसके बावजूद अब तक न तो वैकल्पिक व्यवस्था की गई और न ही नए भवन निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया गया।
स्थानीय लोगों में रोष
क्षेत्रवासियों ने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। लोगों का कहना है कि सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।













