करुणा जहां निर्णय बनती है, वहीं से धर्म आचरण में उतरता है : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

आज से चार दिन तप-मौन और एकांत साधना में युवाचार्यश्री; गौतम प्रतिपदा पर विशेष मांगलिक से मिलेगा सान्निध्य..

पुनित चपलोत
भीलवाड़ा|स्मार्ट हलचल|अपने सुख के लिए किसी दूसरे जीव की पीड़ा स्वीकार करना धर्म की दृष्टि से शुभ नहीं हो सकता। करुणा केवल भाव नहीं, ऐसा विवेक है जो सही समय पर निर्णय बदलने का साहस देता है। ये विचार शांतिभवन में श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने श्रीमद् उत्तराध्ययन सूत्र के तेईसवें एवं चौबीसवें अध्यायों के मूल पाठ का स्वाध्याय कर उनके भावार्थ का विवेचन करते हुए व्यक्त किए।
अरिष्टनेमि के विवाह प्रसंग का उल्लेख करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि बारात के लिए बंधे जीवों को देखकर उनके भीतर प्रश्न उठा कि यदि मेरे कारण हिंसा हो रही है तो यह उत्सव मेरे लिए शुभ कैसे हो सकता है। उन्होंने आभूषण उतारे, रथ मोड़ा और संयम का मार्ग चुन लिया।
राजीमती के प्रसंग में उन्होंने कहा कि त्याग करना जितना महत्वपूर्ण है, त्याग की रक्षा करना उतना ही कठिन है। क्षणिक मोह से विचलित रथनेमि को राजीमती ने संयम का स्मरण कराया और त्यागे हुए भोगों की ओर लौटने को उगले हुए विष को फिर ग्रहण करने जैसा बताया।
तेईसवें ‘केशी- गौतमीय’ अध्ययन का भावार्थ रखते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि वेश और व्रतों की भिन्नताओं से उठे प्रश्न संवाद से सुलझे। मतभेद अपने आप में समस्या नहीं, संवाद का अभाव समस्या बनता है। शंका सामने रखी जाए, प्रज्ञा से विचार हो और सम्मान बना रहे तो दूरी घटती है।
गौतम स्वामी के लिए प्रयुक्त ‘विद्या और चरण में पारंगत’ विशेषण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञान और आचरण दोनों का संतुलन साधना की आवश्यक शर्त है। केवल जानना पर्याप्त नहीं, जीवन में उसका उतरना भी जरूरी है।
चौबीसवें ‘प्रवचन माता’ अध्ययन में पांच समितियों और तीन गुप्तियों का विवेचन करते हुए बताया कि चलने, बोलने, लेने-रखने, आहार और दैनिक व्यवहार में सावधानी के साथ मन, वचन और काया को अशुभ से रोकना साधक की निरंतर जागरूकता का हिस्सा है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि अरिष्टनेमि ने करुणा को निर्णय बनाया, राजीमती ने संयम को दृढ़ता दी, केशी- गौतम ने संवाद से संशय मिटाए और प्रवचन माता ने व्यवहार को सजगता से जोड़ा। धर्म का वास्तविक प्रभाव तभी है, जब वह विचार बनकर न ठहरे, बल्कि निर्णयों को दिशा दे, संबंधों में संवाद बचाए और आचरण को संयमित करे।
इस अवसर पर अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने युवाचार्यश्री से तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। धर्मसभा में महाराष्ट्र,गुजरात, मध्यप्रदेश सहित प्रदेश के विभिन्न अंचलों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने दर्शन कर मंगल आशीर्वाद लिया।
श्रीसंघ शांति भवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि युवाचार्यश्री शुक्रवार से चार दिवसीय तप, मौन एवं एकांत साधना में रहेंगे। साधना पूर्ण होने के बाद गौतम प्रतिपदा नववर्ष के अवसर पर 10 नवम्बर को प्रातः 7.30 बजे विशेष मंगल पाठ प्रदान करेंगे।
उन्होंने बताया कि इस अवधि में प्रतिदिन प्रातः 8.30 बजे हितमितभाषी हितेंद्र ऋषिजी एवं साध्वीवृंद श्रीमद् उत्तराध्ययन सूत्र का स्वाध्याय कर उसके भावार्थ पर प्रवचन देंगे।