हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमार
अशोक मधुप
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स्मार्ट हलचल|आज एक सिंतबर हिंदी साहित्यकार −गजलकार दुष्यंत कुमार का जन्म दिन है। बिजनौर के राजपुर नवादा गांव में एक सिंतबर 1933 में जन्मे दुष्यंत कुमार का मात्र 43 वर्ष की आयु में 30 दिसंबर 1975 को भोपाल में उनका निधन हुआ। उनका मूल नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था और उन्होंने अपने काव्य-लेखन का आरंभ दुष्यंत कुमार परदेशी के नाम से किया था। कविताएँ दसवीं कक्षा से ही लिखने लगे । इसे आगे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों नया आयाम मिला। इन दिनों वह ‘परिमल’ और ‘नए पत्ते’ जैसी संस्थाओं के साथ सक्रिय रहे और उन्हें इलाहाबाद में सक्रिय साहित्यकारों का सान्निध्य मिला। उन दिनों इलाहाबाद में कमलेश्वर, मार्कण्डेय और दुष्यंत की मित्रता लोकप्रिय रही थी।
वह कविता, नाटक, एकांकी, उपन्यास सदृश विधाओं में एकसमान लेखन करते रहे थे लेकिन उन्हें कालजयी लोकप्रियता ग़ज़लों से प्राप्त हुई। ‘हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं’ जैसी पंक्तियों के साथ समय की विडंबनाओं को प्रश्नगत करती उनकी अभिव्यक्ति संसद से सड़क तक गूँजती है और आम आदमी उनमें अपनी आवाज़ की तलाश कर पाता है। लोगों की जुबाँ पर चढ़ी उनकी ग़ज़लें समय की परख करने और उससे लड़ने का हथियार बन सामने आती हैं।
‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसंत’ उनके काव्य-संग्रह हैं जबकि ‘छोटे-छोटे सवाल’, ‘आँगन में एक वृक्ष’ और ‘दुहरी ज़िंदगी’ के रूप में उन्होंने उपन्यास विधा में योगदान किया है। ‘और मसीहा मर गया’ उनका प्रसिद्ध नाटक है और ‘मन के कोण’ उनके द्वारा रचित एकांकी है। उन्होंने ‘एक कंठ विषपायी’ शीर्षक काव्य-नाटक की भी रचना की है। उनके स्थायी यश का आधार उनका इकलौता ग़ज़ल-संग्रह ‘साये में धूप’ है जिसकी दर्जनाधिक ग़ज़लें हिंदी-देश के संवाद और संबोधन में रोज़मर्रा का साथ निभाती हैं।
हिंदी साहित्यकार −गजलकार दुष्यंत कुमार हिंदी गजल के लिए जाने जाते हैं। वे हिंदी गजल के लिए विख्यात है किंतु उन्हें यह ख्याति हिंदी गजलों के लिए नहीं , हिंदुस्तानी गजलों के लिए मिली। संसद से सड़क तब मशहूर हुए उनके शेर हिंदी में नहीं,हिंदुस्तानी हिंदी में हैं। हिंदुस्तानी हिंदी जो बिजनौर वालों की भाषा है। हिंदुस्तानी हिंदी जो बिजनौरी है। हिंदुस्तानी हिंदी में उन्होंने सभी प्रचलित शब्दों को इस्तमाल किया। शब्दों को प्रचलित रूप में इस्तमाल किया।
वे अपनी पुस्तक “साए में धूप“ की भूमिका में खुद कहते हैं । ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन,एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू—दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है । उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ’वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।
—कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ’शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ,किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है,जिस रूप में वे हिन्दी में घुल−मिल गये हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिन्दी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है । ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘ॠतु’ ‘रुत’ हो गई है।
—कि उर्दू और हिन्दी अपने—अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ।
—कि ग़ज़ल की विधा बहुत पुरानी,किंतु विधा है,जिसमें बड़े—बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य—रचना की है। हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है।
ग़ज़ल पर्शियन और अरबी से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब हैं औरतों से अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता हैं कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण अर्थ हैं माशूक से बातचीत का माध्यम। उर्दू के साहित्यकार स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी ने ग़ज़ल की भावपूर्ण परिभाषा लिखी हैं। कहते हैं कि, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते −भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाता हैं जहां से वह निकल नहीं सकता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती हैं। उसी करूण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रगट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श हैं’।
दुष्यंत की गजलों की खूबी है साधारण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग, हिंदी− उर्दू के घुले मिले शब्दों का प्रयोग । चुटीले व्यंग उनकी गजल की खूबी है।वे व्यवस्था और समाज पर चोट करते हैं। ये ही उन्हें सीधे आम आदमी के दिल तक ले जाती है। उनकी ये शैली उन्हें अन्य कवियों से अलग और लोकप्रिय करती है।
आम आदमी और व्यवस्था पर चोट करने वाले उनके शेर, व्यवस्था पर चोट करते उनके शेर सड़कों से संसद गूंजते हैं। शायद दुष्यंत कुमार अकेले ऐसे साहित्यकार होंगे , जिसके शेर सबसे ज्यादा बार संसद में पढ़े गए हों। सभाओं में नेताओं ने उनके शेर सुनाकर व्यवस्था पर चोट की हो। सरकार को जगाने और जनचेतना का कार्य किया हो। उन्होंने हिंदी गजल भी लिखी, पर वह इतनी प्रसिद्धि नही पा सकी, जितनी हिंदुस्तानी हिंदी में लिखी गजल लोकप्रिस हुईं।
उनके गुनगुनाए जाने वाले उनके कुछ हिंदुस्तानी हिंदी के शेर हैं−
−वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है।
−रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारों।
−कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारों।
− यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसतें है,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा,
ये जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मै सज्दे में नही था, आपको धोखा हुआ होगा।
−गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में ,
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए।
−पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं ।
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है ,
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं ।
−सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी ,
इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ।
−तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए,
छोटी—छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।
हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत
तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठा कर फेंक दीं।
गजल
हो गई है पीर पर्वत सी पिंघलनी चाहिए,
अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
