चित्तौड़गढ़ में आस्था का चीरहरण…… बप्पा के विसर्जन के नाम पर नगर परिषद ने पार की हदें, कचरे की तरह फेंकी गई मूर्तियां

विशेष रिपोर्ट-आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ ।स्मार्ट हलचल|शक्ति, भक्ति और त्याग की पावन नगरी चित्तौड़गढ़ में इन दिनों आस्था के साथ जो खिलवाड़ हुआ है, उसने हर धर्मप्रेमी और आस्थावान का दिल छलनी कर दिया है। 25 सितंबर को जहां एक ओर शहर में हजारों भक्तों ने नम आंखों और अपार श्रद्धा के साथ गणपति बप्पा को विदा किया,वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक तंत्र और नगर परिषद ने असंवेदनशीलता की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने इंसानियत और धार्मिक भावनाओं दोनों को शर्मसार कर दिया है ।
दिखावे का विसर्जन और असलियत का काला सच !
25 सितंबर की रात से लेकर 26 सितंबर की सुबह 5 बजे तक गंगा-गंभीरी नदी के तट पर गणपति विसर्जन का दौर चला ,भक्तों को लगा कि प्रशासन ने बड़े ही सुचारू और धार्मिक मर्यादा के साथ इंतजाम किए हैं । लेकिन,सूरज की पहली किरण के साथ ही जो सच सामने आया, उसने सभी को सन्न कर दिया । चश्मदीदों और सामने आई तस्वीरों के मुताबिक, गंभीरी नदी में विसर्जित की गई मूर्तियों को नगर परिषद के कर्मचारियों ने जेसीबी की मदद से ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में ऐसे भरा जैसे कोई मलबा या कचरा उठाया जा रहा हो ,इसके बाद इन मूर्तियों को बिरला सीमेंट फैक्ट्री और मूंगा का खेड़ा के पास स्थित नदी के पुल पर ले जाया गया और वहां से उन्हें नीचे पानी और पत्थरों पर यूं फेंक दिया गया,जैसे कचरे को ठिकाने लगाया जा रहा हो ।
क्या यही है हमारी प्रशासनिक व्यवस्था !
सवाल यह उठता है कि जिस बप्पा को दस दिनों तक विधि-विधान से पूजा गया, जिन्हें सोने-चांदी के मुकुट पहनाए गए और लड्डुओं का भोग लगाया गया,उनके साथ यह सलूक क्यों किया गया ? क्या नगर परिषद के लिए गणपति बप्पा सिर्फ एक ‘कचरा’ बनकर रह गए थे ? तस्वीरें खुद इस दर्द की गवाही दे रही हैं कि कैसे मूर्तियां पुल से नीचे पत्थरों पर गिरकर चकनाचूर हो गईं और बप्पा के स्वरूप कीचड़ में सने नजर आए । सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि जब गोलप्याऊ पर आयोजित विसर्जन कार्यक्रम में नवनियुक्त सभापति खुद मौजूद थे,तो फिर इस तरह की अमानवीय और लज्जाजनक लापरवाही कैसे बर्दाश्त कर ली गई ?
मुंबई जैसी भव्यता और हमारी विडंबना !
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का उदाहरण हमारे सामने है, जहां गणेशोत्सव की शुरुआत से लेकर विसर्जन तक समुद्र के गहरे पानी में अत्यंत आत्मीयता और पूरी धार्मिक मर्यादा के साथ बप्पा को विदा किया जाता है, ताकि किसी भी स्थिति में जनभावनाएं आहत न हों। लेकिन चित्तौड़गढ़ में इसके विपरीत, जनता की भावनाओं का सरेआम मजाक उड़ाया गया ।
अगर अब भी नहीं सुधरे, तो भड़केगा जनकोष !
यह घटना चित्तौड़गढ़ के इतिहास में एक काले धब्बे की तरह दर्ज हो गई है जिसे शहरवासी कभी नहीं भूलेंगे । अब स्थिति यह है कि आने वाले दिनों में मां दुर्गा का पावन पर्व यानी शारदीय नवरात्रि आने वाली है, जिसमें माता का आगमन और विसर्जन होना है। ऐसे में यदि प्रशासन और नगर परिषद ने अपने तौर-तरीकों और व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया, तो आम जनता के सब्र का बांध टूट जाएगा और जनता के इस रोष व क्रोध से बचना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा । प्रशासन को यह समझना होगा कि आस्था के साथ खिलवाड़ अब और सहन नहीं किया जाएगा। क्या नगर परिषद सभापति,आयुक्त और जिम्मेदार अधिकारी इस अमानवीय कृत्य पर जवाब देंगे ?