; फूल-पाती मांगकर भक्त करते हैं मनोकामना पूरी होने की अरदास
(सत्यनारायण टेलर)
अरवड़@- स्मार्ट हलचल|मेवाड़ की धरा पर स्थित प्राचीन शक्तिपीठ धनोप माता मंदिर श्रद्धा, आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। अरवड़ से करीब सात किलोमीटर दूर धनोप गांव में ऊंचे टीले पर स्थित इस मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है। नौ दिन तक भरने वाले विशाल मेले में दूर-दराज के गांवों और शहरों से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में भक्ति, पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों से माहौल धर्ममय बना रहता है। धनोप माता मंदिर की प्राचीनता का अंदाजा यहां मौजूद विक्रम संवत 912, चैत्र सुदी द्वितीया के शिलालेख से लगाया जाता है। इसे करीब 1100 वर्ष पुराना शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में धनोप एक समृद्ध नगर था, जहां सुंदर मंदिर, भवन, बावड़ियां और कुंड बने हुए थे। नगर के दोनों ओर मानसी और खारी नदियां बहती थीं। इनके प्राचीन अवशेष आज भी क्षेत्र में मौजूद बताए जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार, यह क्षेत्र राजा धुंध की नगरी ताम्बवती के नाम से जाना जाता था और धनोप माता उनकी कुलदेवी थीं। पांच स्वरूपों में विराजित हैं माता रानी मंदिर में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां अन्नपूर्णा, अष्टभुजा चामुंडा, बीसभुजा देवी और कालिका माता सहित देवी के पांच स्वरूपों की मान्यता है। मंदिर में शिव-पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और चौंसठ योगिनियों की प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। मंदिर के एक ओर ओगड़नाथ का स्थान और दूसरी ओर भगवान शिव अपने परिवार के साथ विराजमान हैं। मंदिर के बाहर स्थापित सिंह की प्रतिमा भी आकर्षण का केंद्र है। फूल-पाती मांगकर करते हैं मनोकामना धनोप माता के दरबार में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए फूल-पाती मांगते हैं। भक्तों में मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता रानी पूरी करती हैं। इसी आस्था के चलते नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। भक्त माता के दर्शन के बाद भैरूजी के दर्शन भी करते हैं। नौ मीटर के चरने और चुनरी से होता है श्रृंगार माता रानी का प्रतिदिन फूल-पत्तियों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। पुजारी माता को नौ मीटर का चरना (घाघरा), नौ मीटर की ओढ़नी (चुनरी) और आभूषण धारण करवाते हैं। छत्र से सुसज्जित माता का दरबार भक्तों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। नवरात्र में माता के विशेष पूजन और श्रृंगार के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। नौ दिन भंडारा, सुरक्षा के विशेष इंतजाम नवरात्र के दौरान मंदिर में नौ दिन तक विशाल मेले का आयोजन होता है। श्रद्धालुओं के लिए भंडारे की व्यवस्था की जाती है। भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था के लिए अस्थायी पुलिस चौकी भी स्थापित की जाती है। मंदिर परिसर और आसपास विभिन्न समाजों की धर्मशालाएं बनी हुई हैं, जहां बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को ठहरने की सुविधा मिलती है। दो माह तक सेवा में रहते हैं पुजारी मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा के अनुसार पुजारी परिवारों की बारी निर्धारित रहती है। पुजारी अपने औसरे के दौरान करीब दो माह तक मंदिर की सेवा में रहते हैं और नियमानुसार बारी बदलती रहती है। मंदिर से जुड़ी परंपराओं को आज भी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है। ट्रस्ट संभालता है व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी धनोप माता मंदिर ट्रस्ट के माध्यम से मंदिर की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। ट्रस्ट अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह राणावत और मुख्य पुजारी परिवार मंदिर परिसर की साफ-सफाई, रोशनी, पानी, बर्तन तथा श्रद्धालुओं की आवश्यक सुविधाओं का ध्यान रखते हैं।