फूलिया कलां का परंपरागत दड़ा उत्सव: हजारों दर्शकों के बीच बिना रेफरी का रोमांचक खेल
इस बार दड़ा गढ़ में ही समाप्त हुआ,इसलिए वर्ष को सामान्य माना गया..
शाहपुरा@(किशन वैष्णव)फूलिया कलां उपखंड क्षेत्र के ग्राम धनोप बधुवार में मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित धनोप दड़ा महोत्सव ने एक बार फिर ग्रामीणों को रोमांच, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम दिखाया। रियासतकाल से चली आ रही यह अनोखी परंपरा आज भी अपने पूरे गौरव और शक्ति के साथ जीवित है। मान्यता है कि इस खेल के माध्यम से अगले वर्ष का मौसम और समृद्धि का अनुमान लगाया जाता है।
महोत्सव में हजारों दर्शक और ग्रामीण शामिल हुए। दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक दड़ी फेंक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें गांव के निवासी और युवा उत्साह के साथ भाग ले रहे थे। इसके बाद नगाड़ों की गूंज के बीच धनोप गढ़ में करीब 7 किलो वजनी दड़े की पूजा-अर्चना ठाकुर सत्येंद्र सिंह राणावत और जेनेंद्र सिंह राणावत द्वारा विधिपूर्वक संपन्न की गई।2 बजे पटेल महावीर गुर्जर द्वारा दड़ा फेंका गया और महोत्सव का मुख्य खेल शुरू हुआ। खेल की सबसे अनोखी बात यह रही कि इसे बिना रेफरी, बिना सीटी खेला गया, फिर भी शांति और अनुशासन पूरी तरह बना रहा।इस बार दड़ा हवाले तक नहीं पहुंच पाया, बल्कि यह सुनारों के घर, कल्याण धणी मंदिर और बालाजी की दिशा में गया।अधिकांश समय दड़ा गढ़ चौक और सदर बाजार के बीच ही रहा। ग्रामीण मान्यता के अनुसार, दड़ा जिस दिशा में घूमता है, वही अगले वर्ष के सुख-समृद्धि या अकाल सूकाल का संकेत देता है। इस बार दड़ा गढ़ में ही समाप्त हुआ, इसलिए वर्ष को सामान्य माना गया।महोत्सव के दौरान गांव में बाजार और बिजली बंद रखी गई। सुरक्षा व्यवस्था के लिए फूलिया कलां थाना पुलिस जाब्ता मौके पर मौजूद रहा, जबकि ग्राम पंचायत द्वारा खिलाड़ियों के लिए खेल क्षेत्र में बालू-मिट्टी डलवाई गई, ताकि चोटिल होने की संभावना कम हो।खेल का मनोरंजन और उत्साह देखने लायक था। बच्चों के लिए चकरी झूले लगाए गए, जिनका उन्होंने भरपूर आनंद लिया। आसपास की छतों पर सैकड़ों दर्शकों ने तानों और जयकारों के साथ खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाया। खेल समाप्ति के बाद सभी खिलाड़ियों को गढ़ की ओर से गुड़, जबकि पालीवाल बोहरा समाज की ओर से गुड़-अफीम प्रसाद स्वरूप वितरित किया गया।धनोप का दड़ा महोत्सव आज भी अपने ऐतिहासिक महत्व, मनोरंजन और आस्था के कारण जीवित है। यह महोत्सव न केवल ग्रामीण संस्कृति की पहचान है,बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे परंपरा,अनुशासन और सामूहिक उत्साह के माध्यम से एक छोटे गांव की शक्ति और गौरव पूरे क्षेत्र में झलकता है।इस बार के महोत्सव का निष्कर्ष भी दर्शकों के लिए उत्साहजनक रहा अगला साल सामान्य रहेगा, और परंपरा के इस खेल ने एक बार फिर यह साबित किया कि धनोप दड़ा महोत्सव सिर्फ खेल नहीं, बल्कि इतिहास और विश्वास का जीवंत प्रतीक है।


