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विशेष खोजी रिपोर्ट- आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़ । स्मार्ट हलचल|आवारा कुत्तों के प्रबंधन के नाम पर राजस्थान की नगर परिषदों में चल रहा भ्रष्टाचार अब अदालतों और प्रशासनिक फाइलों से बाहर आकर जनता के सामने बेनकाब हो चुका है। टोंक नगर परिषद आयुक्त के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना पर राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी होना और चित्तौड़गढ़-निम्बाहेड़ा में श्वान टेंडरों का फर्जीवाड़ा इस बात का पुख्ता सबूत है कि अधिकारी किस तरह कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे हैं ।
अदालती सख्ती और सुप्रीम कोर्ट का डंडा (टोंक का संदर्भ)
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर खंडपीठ मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल एवं न्यायाधीश समीर जैन ने टोंक नगर परिषद के आयुक्त धर्मपाल जाट के खिलाफ अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई 3 नवंबर 2026 को होगी । 19 मई 2026 सुप्रीम कोर्ट ने Suo Motu Writ Petition ( Civil ) No. 5/2025 के पैरा-111 में स्पष्ट सख्त निर्देश दिए थे कि लगातार अवहेलना करने पर दोषी अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई होगी । खतरनाक, आक्रामक, लाइलाज बीमार या पागल कुत्तों के लिए पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के आकलन के बाद पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 और एबीसी नियम 2023 के तहत इच्छामृत्यु का कानूनी प्रावधान भी शामिल है ।
चित्तौड़गढ़ काम बंद, श्वानों की बाढ़ और भ्रष्टाचार का खेल !
चित्तौड़गढ़ और निम्बाहेड़ा नगर परिषदों द्वारा आवारा श्वानों के नाम पर जारी ‘दर स्वीकृति और कार्यादेश’ जनहित का काम कम और किसी चहेती फर्म को उपकृत करने का सुनियोजित प्रशासनिक खेल अधिक नजर आता है । चित्तौड़गढ़ में नगर परिषद ने जिस फर्म को कार्यादेश जारी किया था, उसने काम शुरू तो किया लेकिन बीच में ही बंद कर दिया। नतीजा यह है कि शहर और कॉलोनियों में आवारा श्वानों की बाढ़ सी आ गई है। यदि आमजन के साथ कोई हादसा होता है, तो इसकी समस्त जिम्मेदारी नगर परिषद की होगी। परिषद को तुरंत संबंधित फर्म को ब्लैकलिस्ट कर किसी अन्य संस्थान को कार्यादेश देना चाहिए ताकि शहर की आम जनता को राहत मिल सके।
निविदा की शर्त थी कि यदि कोई फर्म या एनजीओ किसी अन्य संस्था से वित्तीय सहायता/अनुदान लेती है, तो वह अपात्र होगी। इसके बावजूद, कैथल (हरियाणा) की गैर-लाभकारी संस्था (NGO) ‘जन्कु फाउण्डेशन’ को 1650 (चित्तौड़गढ़) और 1575 (निम्बाहेड़ा) प्रति नग की दर से कार्यादेश दे दिया गया। जब एनजीओ का ढांचा ही डोनेशन और ग्रांट पर चलता है, तो मूल्यांकन दल ने किस दिव्य दृष्टि से इसे पात्र मान लिया ?
आदेश मिलते ही 24 घंटे के भीतर हरियाणा से आकर चित्तौड़गढ़ में सर्वसुविधायुक्त श्वान केंद्र, आधुनिक ऑपरेशन थियेटर, प्रशिक्षित डॉक्टर और विशेष डॉग कैचिंग वाहन तैनात करने का दावा किया गया। धरातल पर परिषदों ने केवल एक ‘खाली भूखंड’ थमाया, जहाँ बिना किसी स्थाई निर्माण के रातों-रात वैज्ञानिक व्यवस्थाएं कैसे खड़ी हो गईं ?
गणित का विस्फोटक विरोधाभास
चित्तौड़गढ़: कुल अनुमानित लागत 30 लाख तय की गई, जबकि शर्त 23 के तहत प्रति माह 500 कुत्तों सालाना 6,000 कुत्तों के हिसाब से 1,650 प्रति कुत्ता लागत 99 लाख लगभग 1 करोड़ रुपये तक पहुँच जाती है ! 30 लाख के बजट में 99 लाख का भुगतान किस जादू से होगा ?
निम्बाहेड़ा: अनुमानित लागत 80 लाख थी जिसे गुपचुप तरीके से बढ़ाकर 94 लाख 50 हजार कर दिया गया। यहाँ भी 6,000 कुत्तों का खर्च 94.50 लाख बैठता है। फर्म ने काम पूरा कर बिल भी लगा दिए हैं, जबकि धरातल पर स्थिति सिफर है ।
माननीया अब आपकी बारी है !
चित्तौड़गढ़ की कॉलोनियों में आवारा श्वानों का आतंक चरम पर है। यदि किसी आमजन के साथ कोई हादसा होता है, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी नगर परिषद की होगी । चित्तौड़गढ़ की जागरूक जनता जिला कलेक्टर महोदय से पुरजोर मांग करती है कि काम बीच में छोड़कर भागने वाली संबंधित फर्म को तुरंत ब्लैकलिस्ट किया जाए और अन्य संस्था को कार्य सौंपकर जनता को राहत दी जाए। दोनों ही जगह के इस संदिग्ध टेंडर प्रक्रिया, तकनीकी पात्रता और धरातल पर श्वान केंद्र के इंफ्रास्ट्रक्चर की एक स्वतंत्र व निष्पक्ष कमेटी से भौतिक और वित्तीय जांच करवाई जाए । जांच पूरी होने तक निम्बाहेड़ा के इस टेंडर के तहत होने वाले सभी भुगतानों पर तुरंत रोक लगाई जाए।