डमी स्कूल–कोचिंग का गठजोड़, शिक्षा के भविष्य पर संकट

सवाई माधोपुर 3 मई।स्मार्ट हलचल|भारतीय शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां ज्ञान का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे धुंधला होता जा रहा है और उसकी जगह एक कृत्रिम प्रतिस्पर्धी बाजार लेता दिख रहा है। “डमी स्कूल” और कोचिंग संस्थानों के बीच बढ़ता गठजोड़ इसी संकट का सबसे खतरनाक रूप बनकर उभरा है। यह केवल एक प्रशासनिक खामी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर गहराई तक पैठ चुका वह विकार है, जो शिक्षा की जड़ों को खोखला कर रहा है।
*डमी स्कूल की अवधारणा अपने आप में ही शिक्षा के मूल सिद्धांतों का उपहास है। छात्र का नामांकन विद्यालय में होता है, लेकिन उसकी उपस्थिति कागजों तक सीमित रहती है। वास्तविक शिक्षा कोचिंग संस्थानों में होती है, जहां पढ़ाई का उद्देश्य ज्ञान नहीं, बल्कि परीक्षा में अधिकतम अंक प्राप्त करना रह जाता है।* स्कूल, जो कभी व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक विकास के केंद्र थे, आज केवल प्रमाणपत्र देने वाली औपचारिक संस्थाएं बनते जा रहे हैं।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह कोई बिखरी हुई समस्या नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र है। कोचिंग संस्थान, स्कूल प्रबंधन की मिलीभगत से यह “डमी मॉडल” फल-फूल रहा है। कोचिंग संस्थान छात्रों को पैकेज के रूप में डमी एडमिशन उपलब्ध कराते हैं, स्कूल बिना पढ़ाए भारी फीस वसूलते हैं और प्रशासनिक तंत्र इस पूरे खेल पर आंखें मूंदे रहता है। परिणामस्वरूप, जहां स्कूलों की कक्षाएं सूनी हैं, वहीं कोचिंग सेंटरों में भीड़ उमड़ रही है।
यह स्थिति केवल शिक्षा के बाजारीकरण का उदाहरण नहीं, बल्कि नैतिक पतन का भी संकेत है। शिक्षा, जो कभी संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम मानी जाती थी, अब एक उत्पाद बन चुकी है। इस “शिक्षा प्रदूषण” ने छात्रों को उनके प्राकृतिक शैक्षणिक परिवेश से काट दिया है। स्कूल का वातावरण, जहां सामाजिक संवाद, अनुशासन, खेल और नैतिक मूल्यों का विकास होता था, अब उनके जीवन से गायब होता जा रहा है। इसका सबसे गंभीर प्रभाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कोचिंग का अत्यधिक दबाव, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ और सामाजिक अलगाव उन्हें तनाव और अवसाद की ओर धकेल रहे हैं। कई मामलों में यह दबाव आत्मघाती प्रवृत्तियों तक पहुंच जाता है, जो समाज के लिए एक खतरनाक संकेत है।
सरकार की अब तक की नीतियां इस समस्या पर प्रभावी क्यों नहीं हो सकीं इसके संबंध में विश्लेष्ण करने पर पता इसका उत्तर स्पष्ट है कि हमने लक्षणों का इलाज किया, बीमारी का नहीं। बायोमेट्रिक उपस्थिति और औचक निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं कागजों तक सीमित रह गईं, क्योंकि व्यवस्था को लागू करने वाले ही कहीं न कहीं इस तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ईमानदारी का अभाव रहेगा, तब तक कोई भी सुधार अधूरा ही रहेगा।
समाधान केवल कड़े नियमों में नहीं, बल्कि सोच और संरचना में बदलाव में निहित है। 11वीं और 12वीं के शैक्षणिक प्रदर्शन को महत्व देना, बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच तालमेल स्थापित करना और एक स्वतंत्र, स्वायत्त शिक्षा नियामक संस्था का गठन, ये कदम इस दिशा में आवश्यक हैं। साथ ही, कोचिंग संस्थानों पर सख्त नियंत्रण और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है।
लेकिन यह लड़ाई केवल सरकार या संस्थानों की नहीं है। अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि उनके बच्चों की सफलता केवल रैंक और अंकों से नहीं मापी जा सकती। एक संतुलित, संवेदनशील और नैतिक व्यक्ति का निर्माण ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
समय आ गया है कि “शिक्षा बचाओ” केवल एक नारा न रहकर एक सामाजिक आंदोलन बने। अभी भी हमने इस “डमी मॉडल” को अनदेखा किया, तो आने वाली पीढ़ियों को हम एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था सौंपेंगे, जो केवल डिग्रियां देगी, ज्ञान नहीं, प्रतिस्पर्धा सिखाएगी है, जीवन नहीं।

लेखक:
किरोड़ी सांकड़ा