(आलेख : वीजू कृष्णन, अनुवाद : संजय पराते)
स्मार्ट हलचल|प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के हुक्म के आगे आत्म-समर्पण कर दिया है और भारत की संप्रभुता से गंभीर रूप से समझौता करते हुए एक अपमानजनक और एक-तरफ़ा व्यापार सौदे के लिए राज़ी हो गए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक-तरफ़ा तौर पर जिस “डील” का ऐलान किया है और जिसका नरेंद्र मोदी ने एक्स पर स्वागत किया है, वह ऐसा लगता है, जैसे हमारे गले को जूते से दबाकर समझौते के लिए बाध्य किया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि भारतीय प्रधानमंत्री रूस से तेल न खरीदने के लिए राज़ी हो गए हैं, बदले में अमेरिका 18% का “कम” पारस्परिक शुल्क लगाएगा, भारत अपने शुल्क को शून्य करेगा और गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करेगा। अपनी घोषणा में ट्रंप ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और कई दूसरे उत्पादों के 500 अरब डॉलर से ज़्यादा की खरीद के अलावा, बहुत ऊँचे स्तर पर “अमेरिका से खरीद” का वादा किया है। मोदी ने आगे खुशी ज़ाहिर की कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर अब कम शुल्क लगेगा और भारत के 140 करोड़ लोगों की ओर से तरफ से उन्होंने ट्रंप को धन्यवाद भी कहा। इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि इस तरह से देश को बेचने को फायदेमंद बताया गया हो और एक असमान सौदे को इतने गुलामी भरे एहसान के साथ स्वीकार गया हो। इतनी बड़ी असर वाली किसी सौदेबाजी की घोषणा पहली बार सोशल मीडिया के जरिए की गई है और संसद या राज्यों के साथ बिना किसी विचार-विमर्श के गुप्त तरीके से की गई है।
जिन देशों ने लंबे साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों के बाद अपनी आज़ादी हासिल की हैं, उन्हें ऐसे कई अनुभव हुए हैं, जहाँ उपनिवेशवादी शासन ने सीधे उनके अधिकारों और घरेलू खेती के साथ-साथ उद्योगों को बचाने या बढ़ावा देने की उनकी क्षमता को रोककर रखा था। खेती की जान-बूझकर उपेक्षा, निःऔद्योगीकरण के साथ उपनिवेशवादी लूट, संसाधनों की बर्बादी और विनिर्मित सामानों की डंपिंग हुई, जिसमें अक्सर सैन्य ताकत का भी हाथ होता था। पहले के जमाने में देशों पर गुलामी और उनके बाजारों तक बिना रोक-टोक पहुंच के कारण संबंधित देशों के लोग उनके सामानों के ग्राहक बन जाते थे। अब यह जमाना एक अलग रूप में वापस आ रहा है। आज फ़र्क यह है कि भाजपा-आरएसएस की अगुवाई वाली राजग सरकार जिस भारतीय शासक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, वह बिना रोक-टोक के बाजार तक पहुँच, बिना रोक-टोक के मुनाफ़े और भारत के करोड़ों किसानों की ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी की बिल्कुल भी चिंता न करने के वादे के साथ साम्राज्यवाद के लिए लाल गलीचा बिछा रही है। अगर उस समय उपनिवेशवादी शासन आर्थिक गिरावट के लिए सीधे ज़िम्मेदार था, तो अब असमान व्यापार सौदा भी वैसा ही असर डालेंगी।
*भारतीय किसानों की ज़िंदगी गिरवी रखने वाला असमान सौदा*
भारत-अमेरिका व्यापार पर अंतरिम रूपरेखा समझौता से पहले इंग्लैड और यूरोपियन यूनियन के साथ दूसरे कई असमान मुफ्त व्यापार समझौते हुए हैं और इसके बाद ऐसे कई समझौते और होंगे। यूरोपियन यूनियन के बजट का सबसे बड़ा आबंटन साझा कृषि कार्यक्रम के लिए आबंटन है — यह 2014 और 2020 के बीच कुल खर्च का लगभग 38 प्रतिशत था, जो कुल 408.31 अरब यूरो (43.8 लाख करोड़ रूपये) था ; 2021 से 2027 के लिए यह रकम लगभग 387 अरब यूरो (41.5 लाख करोड़ रूपये) या कुल बजट का 31 प्रतिशत तय है। भारत में हाल के संघीय बजट में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों के लिए 1.37 लाख करोड़ रूपये या बजट का सिर्फ़ 2.7 प्रतिशत आबंटित किया गया है।
2026 में खेती के कार्यक्रमों के लिए अमेरिकी संघीय सरकार द्वारा लगभग 18.65 लाख किसानों को 44.3 अरब डॉलर (4,02,132 करोड़ रूपये) का भुगतान करने का अनुमान है। इसका मतलब है कि हर व्यक्ति को 23,753 डॉलर या लगभग 21,56,000 रूपये की सब्सिडी मिलेगी। भारत में खेती की सब्सिडी लगभग 57.5 अरब डॉलर (लगभग 5 लाख करोड़ रूपये) है और यहाँ लगभग 14.6 करोड़ किसान हैं। एक भारतीय किसान के लिए यह सब्सिडी लगभग 373 डॉलर या लगभग 34,000 रुपए होगी। अमेरिका में खेत का औसत आकार 469 एकड़ है, जबकि 2000 एकड़ से ज़्यादा के खेत कुल खेती की ज़मीन का 61 प्रतिशत है। अमेरिका में 3,50,000 डॉलर या लगभग 3.18 करोड़ रूपये से कम की नगद आय करने वाले किसानों को छोटाबकिशन माना जाता है और इतनी आय वाले “छोटे खेत” सभी खेतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। भारत में खेतों का औसत आकार लगभग 2.67 एकड़ है और 86 प्रतिशत लोगों के पास 5 एकड़ से कम ज़मीन है, और सरकार के दावों को यदि सच माना जाएं, तो वे 1,64,000 रूपये या लगभग 1807 डॉलर से कम कमाते हैं। तेज़ी से कम होती सरकारी मदद के साथ खराब हालात में जी रहे गरीब भारतीय किसान को अमेरिका के बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले अमीर किसानों और कृषि-व्यापार के साथ सीधे मुकाबले में खड़ा होना पड़ेगा।
अमेरिका-भारत संयुक्त बयान किसानों के इस सबसे बुरे डर की पुष्टि करता है कि भाजपा-राजग सरकार ने भारत के किसानों की ज़िंदगी और रोजी-रोटी को गिरवी रख दिया है। इसने एक बार फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद और घरेलू एकाधिकार के आगे अपनी पूरी गुलामी दिखाई है। यह तब है, जब पहले का भी अनुभव है कि भारत-श्रीलंका मुक्त व्यापार समझौता और भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते का भारतीय किसानों, खासकर रबर, चाय, कॉफी, काली मिर्च और दूसरे मसाला उत्पादक किसानों पर बुरा असर पड़ा है। शुल्क-मुक्त आयात की वजह से कीमतें गिर गईं थीं और खासकर केरल राज्य में कई किसानों ने आत्महत्या कर ली थीं।
पहले ही, 2024-25 (अक्टूबर से सितंबर) के समय भारत का कपास आयात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर, 41.3 लाख गांठ तक पहुंच गया है। भारत का सबसे बड़ा कपास निर्यातक अब अमेरिका बन गया है, जिसने 2023-24 और 2024-25 के बीच 8,56,000 गांठों का निर्यात किया है, जो 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। इसके ठीक बाद ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया का नंबर आता है, जिन्होंने क्रमशः 8,54,000 और 8,49,000 गांठों का निर्यात किया है। ट्रंप के टैरिफ युद्ध के दबाव में आकर, आयात में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, केंद्र सरकार ने 2025-26 में कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क में छूट देने का ऐलान किया, जिससे अमेरिका से आयात में 95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका से कच्चे कपास का लगातार आयात भारतीय किसानों के लिए कीमतों में और गिरावट लाएगा और संकट से जूझ रहे, आत्महत्या करने वाले कपास किसानों के खेतों में कर्ज़ बढ़ेगा और किसानों की आत्महत्याएं भी बढ़ेंगी। जब संयुक्त किसान मोर्चा के एक प्रतिनिधिमंडल ने महाराष्ट्र के आत्महत्या के लिए अभिशप्त विदर्भ इलाके का दौरा किया, तो हमने देखा कि कपास के साथ-साथ सोयाबीन की कीमतों में भी भारी गिरावट आई है, जो एक और ऐसी फसल है, जिसका भारत को निर्यात करने के लिए अमेरिका बहुत उत्सुक है।
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भाजपा-राजग सरकार के इरादे साफ कर दिए हैं। उन्होंने कहा है कि, “भारत के पास अमेरिका से कच्चा कपास खरीदने की सुविधा है, तो उससे तैयार कपड़ा उत्पादों का निर्यात शून्य प्रतिशत पारस्परिक शुल्क पर स्वीकार किया जाएगा”, और “जब भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार अंतरिम समझौता को अंतिम रूप दे दिया जाएगा, तो भारत को बांग्लादेश को दी गई छूट की तरह ही लाभ मिलेगा”। इससे यह झूठ पूरी तरह से सामने आ जाता है कि “खेती अमेरिकी व्यापार समझौते के दायरे से बाहर है” और “प्रधानमंत्री किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेंगे।” सरकार साफ़ तौर पर भारतीय उद्योगपतियों को अमेरिका से कपास आयात करने के लिए बढ़ावा देकर शासक वर्ग के हितों को आगे बढ़ा रही है। यह तर्क कि किसानों के हितों का नुकसान नहीं होगा, क्योंकि कुल अमेरिकी निर्यात काफ़ी सीमित है, और अगर भारत पूरी तरह से आयात शुल्क हटा भी देता है, तो भी घरेलू कपास की खपत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, पूरी तरह से गलत है। यह इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि बढ़े हुए आयात का घरेलू कपास की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा — ठीक वैसे ही जैसे भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता के बाद केरल में रबर किसान तबाह हो गए थे। बिना रोक-टोक वाले वैश्विक प्रतिस्पर्धा के सामने, भारतीय कपास किसान अमेरिका के भारी सब्सिडी और आधुनिक प्रौद्योगिकी वाले कपास उत्पादकों के साथ मुकाबला नहीं कर पाएंगे। यह याद रखना चाहिए कि भारत में चल रहे कृषि संकट के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों में से बहुत ज़्यादा संख्या महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे कपास उगाने वाले इलाकों से आती है।
पीयूष गोयल ने किसानों को गुमराह करने के लिए झूठ और धोखे का सहारा लिया है। उन्होंने यह दावा किया है कि खेती के क्षेत्र में अमेरिका को कोई छूट नहीं दी गई है, जबकि भारत-अमेरिका संयुक्त घोषणा का पहला पैराग्राफ ही कुछ और कहता है। इस समझौते से असल में, बड़े अमेरिकन कृषि व्यापारियों के और अमेरिकन किसानों के सस्ते, बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले उत्पाद भारतीय बाजार में भर जाएंगे, जिससे कीमतें गिर जाएंगी। इस घोषणा में कहा गया है : “भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक सामान और अमेरिका के कई तरह के खाने और खेती के उत्पाद पर शुल्क खत्म कर देगा या कम कर देगा, जिसमें सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन, जानवरों के चारे के लिए लाल ज्वार, मेवा, ताज़े और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट, और दूसरे उत्पाद शामिल हैं।” यह किसी के भी अनुमान पर छोड़ दिया गया है कि “दूसरे उत्पाद” में क्या-क्या शामिल होगा। भारत के अनाज किसानों के लिए खतरनाक बात यह है कि इस बारे में कोई साफ बयान नहीं है कि अनाज पर शुल्क सुरक्षा बरकरार रखा जाएगा। इसका मतलब हो सकता है कि भारत का कृषि बाजार अमेरिका के शिकारी कृषि व्यापारियों के लिए पूरी तरह से खोल दिया जाएगा। ऐसी कोई भी घटना किसानों की रोज़ी-रोटी को खतरे में डाल देगी और भारत की खाद्य सुरक्षा से भी समझौता होगा। इसका नतीजा यह होगा कि ‘निवाले के लिए जहाज (शिप टू माउथ)’ वाले दिन वापस आ जाएँगे और पीएल-480 जैसी बेइज़्ज़ती वाली योजनाओं पर निर्भरता बढ़ जाएगी।
भारत ने अगले पांच सालों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने का भी वादा किया है, जिसका मतलब है कि इस एग्रीमेंट के तहत उसे हर साल 100 अरब डॉलर की खरीदारी करनी होगी। अमेरिका इस सौदेबाजी का इस्तेमाल भारत के साथ व्यापार घाटे को कम करने के लिए कर रहा है और उसने भारत पर इस तरह के असमान समझौते के लिए दबाव डाला है। पीयूष गोयल इस बात से भी आसानी से बच निकलते हैं कि जहां भारत के निर्यात पर शुरू में लगभग 2.5% से कम अमेरिकी टैरिफ लगाया जाता था, वहीं बाद में अमेरिका ने एकतरफा तौर पर इन करों को 25% और कुछ सामानों पर 50% तक बढ़ा दिया, और अब इसे 18% पर ला दिया है, जो मूल टैरिफ से लगभग सात गुना ज़्यादा है। एक ओर जहां भाजपा-आरएसएस बहुत ज़्यादा जोश में हैं और पूरी तरह से आत्मसमर्पण का जश्न मना रहे हैं, वहीं अमेरिका के कृषि सचिव, ब्रुक रोलिंस ने ज़ोर देकर कहा है कि यह समझौता “भारत के बड़े बाजार में ज़्यादा अमेरिकी कृषि उत्पाद का निर्यात करने, कीमतें बढ़ाने और ग्रामीण अमेरिका में नगद लाने में मदद करेगी”। भले ही चीन, ब्राज़ील और दूसरे देश ट्रंप के ज़बरदस्ती वाले टैरिफ़ के आगे झुकने से मना कर रहे हैं, लेकिन संघ परिवार, जो साम्राज्यवाद के साथ सहयोग करने की अपनी विरासत पर कायम है, ने एक बार फिर भारत के लोगों को धोखा दिया है। यह समझौता ट्रंप के ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ (मागा) की योजना को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है।
ये असमान व्यापार समझौता वही काम करने जा रही हैं, जो 3 कृषि कानून नहीं कर पाए। इसका नतीजा यह होगा कि किसान कंगाल हो जाएंगे और उन्हें बेदखल कर दिया जाएगा। उन्हें मुश्किल हालात में शहरों में जाकर, पूंजीपतियों के इशारे पर, एक ऐसे माहौल में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जहां मजदूरों के अधिकारों की कोई बात नहीं होगी। अगर हम इनका विरोध नहीं करेंगे, तो गुलामी की जंजीरें हमारा इंतज़ार कर रही हैं। लाखों किसानों के लिए यह “करो या मरो” का पल है। इन असमान व्यापार समझौते के खिलाफ 12 फरवरी को पूरे भारत में लोग सड़कों पर उतर आए थे। सीपीआई(एम) और वामपंथ के साथ-साथ लोकतांत्रिक पार्टियां, वर्गीय संगठनों और जन संगठनों के साथ-साथ मेहनतकश लोगों की मुद्दों पर आधारित एकता – संयुक्त किसान मोर्चा, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और कृषि और ग्रामीण मजदूरों के मंच — ने भी सही मायने में एक मज़बूत संघर्ष विकसित करने और इन कदमों का विरोध करने का फैसला किया है। इस समझौते के खिलाफ सबसे बड़ी एकता बनाई जाएगी और 24 मार्च के दिल्ली चलो अभियान को व्यापक रूप से सफल बनाने के लिए पूरी ताकत लगाई जाएगी।










