आढ़तों से दुकानों तक रोज पहुंच रहा प्रतिबंधित वन उत्पाद, छोटे विक्रेताओं पर कार्रवाई और बड़े कारोबारियों पर चुप्पी को लेकर चर्चा तेज जंगल की थाली से बाजार तक! कटरुआ और धरती का फूल प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगने वाला वन उत्पाद माना जाता है। यह जंगल के पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है और कई वन्य जीवों के भोजन का भी स्रोत होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित दोहन से जंगल के प्राकृतिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण इसके संग्रहण और व्यापार पर लागू नियमों का पालन आवश्यक माना जाता है।
गोला गोकरणनाथ खीरी।स्मार्ट हलचल|गोला की मुख्य सब्जी मंडी इन दिनों प्रतिबंधित वन उत्पाद कटरुआ,धरती का फूल के कथित कारोबार को लेकर चर्चाओं में है। आरोप है कि मंडी में आढ़तों के माध्यम से बड़ी मात्रा में कटरुआ फुटकर दुकानदारों तक पहुंचाया जाता है और वहां से खुलेआम बिक्री होती है। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह कारोबार लंबे समय से व्यवस्थित तरीके से चल रहा है।
बताया जाता है कि खुटार रोड स्थित मुख्य सब्जी मंडी इस कारोबार का प्रमुख केंद्र बनी हुई है, जहां कतारबद्ध दुकानों पर कथित रूप से कटरुआ की खरीद-फरोख्त होती है। आरोप है कि हर दिन छोटा हाथी और अन्य वाहनों से वन उत्पाद मंडी तक पहुंचता है और फिर दुकानदारों में वितरित किया जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि चूंकि कटरुआ वन उत्पाद की श्रेणी में आता है, इसलिए बिना प्रभावी निगरानी के इतने बड़े पैमाने पर इसका व्यापार संभव नहीं लगता। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों की बिना मिलीभगत के वन उत्पाद कटरुआ का बड़े पैमाने पर सिंडीकेट सचालित होना संभव नही है और आरोप भी लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और वन विभाग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
चर्चा यह भी है कि इस कथित कारोबार की जानकारी स्थानीय स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक है, लेकिन इसके बावजूद बड़े कारोबारियों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही। वहीं, जब मीडिया में खबरें प्रकाशित होती हैं तो कार्रवाई मुख्य रूप से छोटे फुटकर विक्रेताओं तक सीमित दिखाई देती है। इससे निष्पक्ष कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि मंडी में कटरुआ के साथ-साथ धरती का फूल और गुलइंधे जैसे अन्य वन उत्पादों की भी खुलेआम बिक्री होती है। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो वन संपदा को लगातार नुकसान पहुंचता रहेगा।
वन प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि किसी वनकर्मी, अधिकारी, व्यापारी या अन्य व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाए।
