सोना अग्नि में निखरता है, आत्मा तप से अपने शुद्ध स्वरूप में लौटती है : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

‘नमो तवस्सा’ पद के साथ नवपद ओलीजी का समापन; मंगलवार को तप आराधकों का पारणा-सम्मान, बुधवार से उत्तराध्ययन स्वाध्याय-प्रवचन

पुनित चपलोत

भीलवाड़ा|स्मार्ट हलचल|अग्नि में तपकर सोना बार-बार अपने शुद्ध स्वरूप की ओर लौटता है, उसी तरह तप आत्मा पर जमे कर्मों के आवरण को क्षीण कर उसके मौलिक स्वरूप को प्रकट करता है। तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, जन्म-जन्मांतर से संचित कर्मों की निर्जरा और चेतना के परिष्कार का पुरुषार्थ है। यह विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने शांतिभवन में चल रही नवपद आयंबिल ओलीजी आराधना के नवम एवं अंतिम दिवस ‘नमो तवस्सा’ पद का ध्यान करवाते हुए व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि अरिहंत से प्रारंभ हुई नवपद आराधना तप पर पूर्ण होती है। नौ दिनों की यह साधना केवल स्मरण और वंदन तक सीमित न रहे, बल्कि आचरण का रूप ले। इसे जैन परंपरा की नवरात्रि बताते हुए उन्होंने कहा कि समापन साधना का विराम नहीं, उसे जीवन में उतारने की शुरुआत है।
तप की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव से भगवान महावीर तक तीर्थंकरों और जिनशासन के असंख्य साधकों ने तप से कर्मावरणों को क्षीण किया। नए कर्मों को रोकना संवर है, जबकि संचित कर्मों की निर्जरा तप से होती है। तप की सार्थकता केवल भूखे रहने में नहीं, भीतर के कषायों को कमजोर करने में है।
उन्होंने कहा कि बाह्य और आभ्यंतर दोनों तप आत्मपरिष्कार की दिशा देते हैं। उपवास, एकासन, आयंबिल और कायक्लेश बाह्य तप हैं, जबकि प्रायश्चित्त, विनय और कायोत्सर्ग सहित आभ्यंतर तप भीतर के दोषों को क्षीण करते हैं। बाहरी तप तभी सार्थक है, जब भीतर का अहं, क्रोध, मान और आसक्ति भी तपने लगे।
जिनशासन की तप-परंपरा का उल्लेख करते हुए युवाचार्यश्री ने धर्मरुचि अनगार, गजसुकुमाल अनगार, गौतमस्वामी और भगवान महावीर की साधना का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि प्रभु ने तप को प्रदर्शन से नहीं, सामर्थ्य से जोड़ा। जिसकी जितनी शक्ति हो, वह उतना तप करे, लेकिन तप और तपस्वी के प्रति श्रद्धा अवश्य रखे।
‘नमो तवस्सा’ का भाव समझाते हुए उन्होंने कहा कि तप के प्रति अहोभाव और तपस्वी की निष्कपट अनुमोदना भी साधना है। किसी की तपस्या देखकर ईर्ष्या, उपेक्षा या आशातना का भाव नहीं, बल्कि सम्मान जागना चाहिए। दूसरे के तप का सम्मान अपने भीतर तप की संभावना को भी जागृत करता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि ज्ञानपूर्वक किया गया तप ही सकाम निर्जरा की दिशा देता है। केवल आहार का त्याग पर्याप्त नहीं; उसके साथ आत्मशुद्धि और कर्मक्षय का भाव भी जुड़ना चाहिए।
नवपद आयंबिल ओलीजी की नौ दिवसीय आराधना के समापन पर युवाचार्यश्री ने तप आराधना करने वाले साध्वीवृंद एवं श्रावक-श्राविकाओं के तप की अनुमोदना करते हुए मंगलकामना व्यक्त की।
युवाचार्यश्री के उद्बोधन से पूर्व साध्वी चिंतनश्रीजी ने श्रीपाल-मैना सुंदरी चारित्र का वाचन करते हुए कहा कि जिनवाणी और तप के बिना आत्मकल्याण संभव नहीं। पापों से मुक्ति के लिए जीवन को साधना की आंच में तपाना होगा। श्रीपाल का चारित्र बताता है कि तप ही पुरुषार्थ को धन्यता तक पहुंचाता है।
इस अवसर पर राष्ट्रीय महिला जैन कॉन्फ्रेंस की अध्यक्षा संतोष जैन, महामंत्री रिचा जैन, निर्मल जैन, सूरज लक्ष्मी वीरवाल, अनिता जैन सहित पदाधिकारियों तथा गुड़गांव श्रीसंघ के महामंत्री संदीप जैन के नेतृत्व में आए प्रतिनिधिमंडल ने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्ष 2027 में युवाचार्यश्री का दिल्ली के अरिहंत नगर-ऋषभ विहार में होने वाला चातुर्मास राजधानी क्षेत्र के जैन समाज के लिए विशेष आध्यात्मिक अवसर होगा। प्रतिनिधिमंडल ने चातुर्मास को लेकर जैन समाज में बढ़ते उत्साह और प्रतीक्षा की भावना भी व्यक्त की।
श्रीसंघ शांतिभवन आनंद अनुभूति चातुर्मास के संरक्षक नवरतनमल बंब एवं मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि मंगलवार को शांतिभवन में नवपद आयंबिल ओलीजी के तप आराधक भाई-बहनों का सामूहिक पारणा एवं सम्मान लाभार्थी पोखरणा परिवार एवं रांका परिवार की ओर से होगा। श्रीसंघ की ओर से भी तप आराधकों का अभिनंदन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि बुधवार से युवाचार्यश्री एवं संत-साध्वीवृंद के सानिध्य में श्रीमद् उत्तराध्ययन स्वाध्याय एवं प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.30 से 9.30 बजे तक होंगे।