ईवीएम में जनता का फैसला, रिसॉर्ट्स में पार्षदों की पहरेदारी

(पंकज पोरवाल)

*मतदान थमा तो शुरू हुआ जोड़-तोड़ का दौर, भाजपा के बाद कांग्रेस ने भी की बाड़ेबंदी*

महापौर की कुर्सी के लिए सियासी घेराबंदी तेज, नेता रिसॉर्ट्स में ढूंढ रहे ताज का रास्ता

भीलवाड़ा ।स्मार्ट हलचल|शहर की जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है। अब मशीनों के खुलने का इंतजार है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनाव अभी खत्म नहीं हुआ। मतदान रुकते ही भीलवाड़ा नगर निगम की सत्ता के लिए पर्दे के पीछे का खेल शुरू हो गया है। महापौर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी, इसका गणित अब सिर्फ भाजपा और कांग्रेस की सीटों से तय नहीं होगा। निर्दलीयों की संख्या, करीबी मुकाबलों वाले वार्ड और संभावित क्रॉस वोटिंग ने दोनों प्रमुख दलों की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि भाजपा के बाद कांग्रेस ने भी अपने संभावित पार्षदों की बाड़ेबंदी शुरू कर दी है। ईवीएम में बंद जनादेश अभी सार्वजनिक नहीं हुआ, लेकिन दोनों खेमे अपने-अपने हिसाब से सीटों का आकलन करने में जुटे हैं। जिन वार्डों में मुकाबला कांटे का माना जा रहा है, वहां के प्रत्याशियों पर खास नजर है। परिणाम आने से पहले ही यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि कौन जीत की स्थिति में है और कौन किस खेमे के करीब जा सकता है। बहुमत के आंकड़े और संभावित समीकरणों को लेकर राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर कवायद शुरू कर दी है। ऐसे में चुनाव मैदान में उतरे पार्षद अब सिर्फ प्रत्याशी नहीं, बल्कि महापौर के चुनाव में निर्णायक मोहरे बन गए हैं। नगर निगम के 70 वार्डों में मतदान के बाद अब निगाहें मतगणना पर टिकी हैं। किस दल को कितनी सीटें मिलती हैं और कितने निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर आते हैं, इसी पर निगम की अगली सत्ता का गणित निर्भर करेगा। खास तौर पर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अहम मानी जा रही है। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में इनकी राजनीतिक अहमियत अचानक बढ़ सकती है। मतदान खत्म होते ही राजनीतिक दलों ने संभावित जीत-हार के आंकड़ों पर मंथन शुरू कर दिया है। प्रत्याशियों और स्थानीय नेताओं से लगातार फीडबैक लिया जा रहा है। वार्डवार समीकरणों को खंगाला जा रहा है और संभावित विजेताओं से संपर्क साधने की कोशिशें भी तेज होने की चर्चा है। हालांकि अंतिम तस्वीर मतगणना के बाद ही साफ होगी। महापौर पद के चुनाव में पार्षदों की भूमिका निर्णायक होने के कारण राजनीतिक दल अपने खेमे को एकजुट रखने में जुटे हैं। भाजपा की ओर से प्रत्याशियों को जयपुर भेजे जाने के बाद बाड़ेबंदी की चर्चा तेज हुई है। दूसरी ओर कांग्रेस भी परिणामों के बाद संभावित समीकरणों पर नजर बनाए हुए है। रिसॉर्ट्स में पार्षदों को साथ रखने की कवायद को इसी सियासी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। नगर निगम के चुनावी मैदान में बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशियों के उतरने से दोनों प्रमुख दलों के समीकरण उलझे हुए हैं। 154 निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने मुकाबले को कई वार्डों में त्रिकोणीय और बहुकोणीय बनाया। इनमें से कितने जीतकर निगम पहुंचते हैं, यही तय करेगा कि महापौर के चुनाव में उनकी भूमिका कितनी बड़ी होगी। मतदाताओं ने अपना फैसला सुना दिया है। अब ईवीएम खुलने के साथ ही यह स्पष्ट होगा कि किस दल को सत्ता की चाबी मिलती है। लेकिन यदि आंकड़े किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट बहुमत नहीं देते हैं तो महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता निर्दलीयों और संभावित राजनीतिक समर्थन से होकर गुजर सकता है। 14 सितंबर को मतगणना के साथ ईवीएम जनता का फैसला सुनाएगी, लेकिन महापौर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी-इसका सियासी खेल उससे पहले ही शुरू हो चुका है। फिलहाल स्थिति यह है कि जनता का फैसला ईवीएम में बंद है और राजनीतिक दल अपने-अपने संभावित पार्षदों को सुरक्षित ठिकानों पर रखने में जुटे हैं। चुनाव मैदान में वोटों की लड़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन निगम की सत्ता के लिए सियासी मुकाबला अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है। चुनाव परिणाम के बाद जिस दल के पास बहुमत का आंकड़ा होगा, उसके लिए रास्ता आसान रहेगा। लेकिन यदि सीटों का गणित बहुमत से नीचे रहा तो निर्दलीयों और संभावित बागियों की भूमिका अचानक बढ़ जाएगी। ऐसे में महापौर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए सिर्फ चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होगा-पार्षदों को साथ रखना, समर्थन जुटाना और अंतिम क्षण तक सियासी समीकरण साधना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।