गुरु महिमा से सराबोर हुई साहित्यिक गोष्ठी, कविताओं-गीतों और विचारों से गूंजा शाहपुरा

विद्वानों ने बताया—गुरु केवल शिक्षक नहीं, जीवन को संस्कारित करने वाला प्रकाश पुंज है

शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
गुरु पूर्णिमा पर्व की पावन बेला पर शाहपुरा में आयोजित साहित्यिक गोष्ठी गुरु महिमा, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चिंतन का अनुपम संगम बन गई। कवियों, साहित्यकारों और चिंतकों ने अपनी ओजस्वी, भावपूर्ण और प्रेरणादायी प्रस्तुतियों से ऐसा वातावरण निर्मित किया कि पूरा सभागार गुरु वंदना और भारतीय ज्ञान परंपरा के भावों से सराबोर हो उठा। किसी ने गुरु को अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला सूर्य बताया तो किसी ने राष्ट्र निर्माण और संस्कारों की आधारशिला। काव्य, गीत, दोहे, व्यंग्य और चिंतन की विविध प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को देर तक मंत्रमुग्ध बनाए रखा।
गोष्ठी का शुभारंभ साहित्यकार रवीन्द्र सिंह जाड़ावत की सुमधुर सरस्वती वंदना “वीणा वादिनी हंस वाहिनी, ध्यान धरूँ करूँ नमन शारदे” से हुआ। मां सरस्वती की वंदना के साथ ही पूरे आयोजन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हो गया।
इसके बाद सीए अशोक बोहरा ने महाभारत के प्रसंग पर आधारित अपनी प्रभावशाली कविता “कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब शंखों का नाद हुआ…” प्रस्तुत कर धर्म और कर्तव्य के संदेश को स्वर दिया।
गोष्ठी का मुख्य आकर्षण डॉ. सत्यनारायण कुमावत का गुरु विषय पर विस्तृत एवं चिंतनपरक व्याख्यान रहा। उन्होंने कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि शिष्य के भीतर संस्कारों का बीजारोपण करने वाला दिव्य व्यक्तित्व होता है। उन्होंने उपनिषदों के प्रसिद्ध मंत्र “असतो मा सद्गमय” का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु शिष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब शिष्य में तमोगुण की प्रधानता होती है तो गुरु रुद्र स्वरूप धारण कर उसके भीतर व्याप्त अज्ञान, आलस्य और विकारों का नाश करता है। डॉ. कुमावत ने कहा कि पूर्ण समर्पण, जिज्ञासा और सेवा भाव—ये तीन गुण किसी भी शिष्य के लिए अनिवार्य हैं। इनके अभाव में गुरु से पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता।
जयदेव जोशी ने अपने दोहों में गुरु को पर्वत जैसा धैर्यवान और सागर जैसा विशाल बताते हुए कहा कि गुरु की वाणी ही मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करती है। वहीं डॉ. कमलेश पाराशर ने अपनी कविता “देश को जाति में मत बांटो, संस्कार युवाओं में बांटो” के माध्यम से सामाजिक समरसता और संस्कारों की आवश्यकता पर बल दिया।
आशुतोष सिंह सोदा ने अपनी ओजपूर्ण कविता “युगों-युगों की धर्म ध्वजा आर्यावर्त में लहराऊंगा” सुनाकर राष्ट्रभक्ति का जोश भर दिया। डॉ. परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने “गुरुवर तेरी करूं वंदना, तुमको शीश नवाऊं” प्रस्तुत कर गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त की, जबकि सोमेश्वर व्यास ने कहा कि “हमारी जिंदगी को सही दिशा देते हैं गुरु।”
गोविंद सिंह बड़गुर्जर ने “ए मेरे गुरु, अज्ञान अंधेरा दूर करो” तथा “गुरुजी मैं बालक अज्ञानी” जैसे भावपूर्ण गीतों से श्रद्धा का वातावरण बनाया। वरिष्ठ गीतकार बालकृष्ण जोशी ‘बीरा’ ने “लोभ-मोह-मद निकट न आवे…” और “यूँ राज-ए-दिल जुबां पर लाना न चाहिए” जैसी रचनाओं से जीवन मूल्यों का संदेश दिया।
गोष्ठी में तेजपाल उपाध्याय का व्यंग्य “दुनिया बदली, समय बदल गया, गुरु अब टीचर हो गया” भी खूब सराहा गया। ओम माली ‘अंगारा’, विश्राम ‘विष’, रवीन्द्र सिंह जाड़ावत तथा कैलाश सिंह जाड़ावत ने भी अपनी उत्कृष्ट रचनाओं और गीतों से कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। विशेष रूप से कैलाश सिंह जाड़ावत ने अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय को समर्पित गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं की भरपूर सराहना प्राप्त की।
गोष्ठी के अंत में प्रस्तुत सभी रचनाओं की समीक्षात्मक टिप्पणी गोविंद सिंह बड़गुर्जर ने करते हुए कहा कि ऐसी साहित्यिक गोष्ठियां भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और नैतिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं। कार्यक्रम का समापन गुरु वंदना, भारतीय संस्कृति के गौरव और साहित्यिक चेतना के नव संकल्प के साथ हुआ।