हमीरगढ़ में गणगौर की पारम्परिक रौनक शुरू,सेवरा सजाकर गीत गातीं कन्याएं,नई पीढ़ी में घटती परंपरा पर चिंता

मुकेश खटीक
मंगरोप।हमीरगढ़ नगर पालिका क्षेत्र में धूलंडी के दिन से ही गणगौर पर्व की पारंपरिक रौनक देखने को मिलती है।इस दौरान छोटी-छोटी कन्याएं सज-धज कर समूह में बगीचों की ओर जाती हैं,जहां से वे रंग-बिरंगे फूल,पत्तियां और ताजा दूब एकत्रित कर‘सेवरा’को सुंदर रूप से सजाती हैं।सजाए गए सेवरा को लेकर कन्याओं का समूह सामूहिक रूप से लोकगीत गाते हुए तालाब की पाल स्थित रघुनाथ जी के बगीचे से मुख्य बाजार की ओर प्रस्थान करता है।बाजार से गुजरते समय कन्याएं पारंपरिक गीत—“चकरी लो भाई चकरी लो,काजल टीकी लो”गाकर लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं,जिससे पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है।मुख्य बाजार से आगे बढ़ते हुए ये समूह गणगौर पूजन स्थल पहुंचता है।जहां कन्याएं“गोर गोर गोमती,ईश्वर पूजे पार्वती,मैं पूजा आला गिला,गौर का सोने का टीका”जैसे पारंपरिक गीतों के साथ विधि-विधान से गणगौर माता की पूजा करती हैं।इस परंपरा का विशेष महत्व यह है कि कुंवारी कन्याएं पूरे 16 दिनों तक व्रत रखती हैं और दिन में एक समय ही भोजन ग्रहण करती हैं। यह व्रत उनके लिए श्रद्धा,अनुशासन और संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।
हालांकि बदलते समय के साथ यह प्राचीन परंपरा अब धीरे-धीरे नई पीढ़ी में कम होती जा रही है, जो चिंता का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि इस सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने के लिए समाज को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी परंपराओं से जुड़ी रह सकें।