रूढ़िवादी परंपराओं की जंजीरों में, बंधी हैं औरतें, गूंगी और मीन

स्मार्ट हलचल|जब मैने किया मुंडन मेरा तो किसी ने कहा, औरतें ये नहीं कर सकती,
किसी ने कहा, विधवा के काटे जाते हैं बाल,सुनकर उनकी बातें, लगता है जैसे उलझी पड़ी है, निम्न सोच पर,सोच पर लगे है उनकी जाले रूढ़ियों के…..
लेकिन मैं कहती हूँ, मैं हूँ औरत,
मैं कर सकती हूँ, मैं बदल सकती हूँ।
सिल सकती हूं मुंह उनके जो करते हैं नारी का तिरस्कार….
मैं हूँ शक्ति, मैं हूँ प्रगति, मैं हूँ आजाद।
मैंने कटवाए बाल, उन रूढ़ियों को तोड़ने के लिए, जो कहते हैं नारी ये नहीं कर सकती वो नहीं कर सकती।
तो सुन लो तुम, जो कहते हो औरतें ये नहीं कर सकती,
मैं कहती हूँ, औरतें सब कर सकती हैं, औरतें बदल सकती हैं, दुनियां की रीति नीति जो बनी सिर्फ उसे कमजोर बनाने को,
मैं नहीं हूँ सिर्फ एक औरत,
मैं हूँ एक माँ, एक बेटी, एक बहन।
मैं हूँ एक शक्ति, एक प्रेरणा, एक उड़ान,
मैं हूँ औरत, मैं हूँ जीवन।
मैं नहीं हूँ डरती, नहीं हूँ झुकती,
यूं तोड़कर जंजीरों को आत्मविश्वास के साथ प्रगति का प्रतीक है नारी का यू आगे बढ़ना,बनकर एक नई कहानी,नहीं डरती वह, नहीं झुकती वह,
बढ़ती है आगे, अपनी शक्ति से।
वह है शक्ति, वह है प्रगति,
वह है आजाद, वह है स्वतंत्र।
नहीं रोक सकती उसे कोई भी बाधा,
वह बढ़ती है आगे, अपने लक्ष्य की ओर।
तोड़कर गैर जरूरी गैर कानूनी ढकोसलों,रूढ़ियों को, गढ़ती है अपनी काबिलियत को कर रूढ़ियों को दरकिनार……
वह बढ़ती है आगे, अपनी स्वतंत्रता के लिए।नहीं डरती,नहीं झुकती वह,
बढ़ती है आगे, अपनी शक्ति से अपने जीवन के पग पथ पर निरन्तर…… महिला दिवस पर सभी महिलाओं को हार्दिक शुभकामनाएं। ✍️ मंजू सिंह (सोशल एक्टिविस्ट)