Homeसोचने वाली बात/ब्लॉगभारतीय आदिवासी नायक जयपाल सिंह मुंडा के जन्मदिवस पर विशेष आलेख

भारतीय आदिवासी नायक जयपाल सिंह मुंडा के जन्मदिवस पर विशेष आलेख

मदन मोहन भास्कर

स्मार्ट हलचल| आदिवासी नायक जयपाल सिंह मुंडा असाधारण प्रतिभा के धनी और अपार ऊर्जा से भरपूर व्यक्ति थे। वे अपनी मातृभाषा मुंडारी के साथ-साथ अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, इटालियन, हिंदी और नागपुरी भाषाओं में भी निपुण थे। जयपाल सिंह एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी थे। जिन्हें प्रतिष्ठित “ऑक्सफोर्ड ब्लू” का खिताब प्राप्त हुआ। उनके नेतृत्व में भारतीय हॉकी टीम ने 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता था। वे पहले आदिवासी व्यक्ति थे, जिन्होंने भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) में स्थान प्राप्त किया। एक उत्कृष्ट नेता, प्रभावी वक्ता, संगठक, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद और कुशल प्रशासक के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। वे भारतीय संविधान सभा के भी सदस्य थे। बहुआयामी प्रतिभा के बावजूद भारतीय इतिहास और राजनीति में जयपाल सिंह मुंडा को वह स्थान नहीं मिल सका जिसके वे वास्तविक हकदार थे हालांकि आदिवासी समुदाय उन्हें मरंग गोमके (सर्वोच्च नेता) के रूप में सम्मान देता है। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई मुंडारी लोकगीतों में उन्हें बिरसा मुंडा के उलगुलान (क्रांति) की विरासत के रूप में देखा गया है । नागपुरी के कवि अर्जुन भगत ने 1942 में उन पर एक कविता लिखी, जिसकी पंक्ति थी- धन्य विधि के विचारे, दुनिया हरे जयपाल सिंह चरण पधारे। हालांकि दंतकथाओं में कल्पना का पुट होता है और ऐतिहासिक तथ्यों की कमी हो सकती है फिर भी ये किसी नायक की लोकप्रियता को दर्शाने का एक महत्वपूर्ण संकेत होती है। जिस तरह दलितों के उत्थान के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। उसी तरह देश के आदिवासियों के उत्थान में जयपाल सिंह मुंडा का अहम योगदान रहा है। उन्हें भी कभी नहीं भुलाया जा सकता है।

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म कब और कहाँ हुआ ?

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को टकरा-हातुदामी, पाहन टोली गाँव में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत जो वर्तमान झारखंड के बंगाल प्रेसीडेंसी में रांची के खूंटी उपखंड का हिस्सा था। जयपाल सिंह मुंडा के पिता का नाम अमरू पाहन तथा माता का नाम राधामणी था। इनके बचपन का नाम प्रमोद पाहन था। जयपाल सिंह मुंडा का वास्तविक नाम ईश्वर जयपाल सिंह था लेकिन उन्हें झारखंड के आदिवासी मरड़ गोमके कहते थे। जयपाल सिंह मुंडा की शादी 1931 में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष व्योमकेश चन्द्र बनर्जी की नतिनी तारा मजूमदार से हुई थी। तारा से उनकी तीन संतानें दो बेटे वीरेंद्र और जयंत तथा एक बेटी जानकी हुई । उनकी दूसरी शादी जहांआरा से 1954 में हुई, जिनसे एक पुत्र रणजीत जयरत्नम हुआ । जयपाल सिंह का निधन 20 मार्च 1970 को दिल्ली में हुआ।

ऑक्सफोर्ड में तीन विषयों से ग्रेजुएट किया

इनकी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा को देखते हुए स्कूल के प्रधानाचार्य रेवरेंड कैनन कॉसग्रेव ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजने का निर्णय लिया। 1920 में जयपाल सिंह को कैंटरबरी के सेंट ऑगस्टाइन कॉलेज में प्रवेश मिला। इसके बाद 1922 में उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट जॉन कॉलेज में अध्ययन का अवसर मिला। ऑक्सफोर्ड में रहते हुए, उन्होंने अकादमिक और खेल दोनों क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वे हॉकी के एक कुशल खिलाड़ी बने और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की हॉकी टीम का हिस्सा बने। वे पहले भारतीय थे, जिन्हें हॉकी में ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का सम्मान प्राप्त हुआ। इसके अलावा इन्होंने एशियाई छात्रों के लिए ‘ऑक्सफोर्ड हर्मिट्स’ नामक एक खेल समाज की स्थापना की और कॉलेज की डिबेटिंग सोसाइटी के अध्यक्ष भी बने। 1926 में इन्होंने दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।ऑक्सफोर्ड की शिक्षा उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई और आगे चलकर वे एक कुशल खिलाड़ी, शिक्षाविद् और राजनेता के रूप में उभरे।

अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी थे जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह मुंडा एक अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी थे और वे एक महान, दूरदर्शी और विद्वान नेता, सामाजिक न्याय के आदिवासियों के पक्षधर भी थे। रांची में जन्मे हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी में आदिवासी नेता मरड़ गोमके के नाम से विख्यात डॉ. जयपाल सिंह का 1928 में एम्सटर्डम (होलैंड) में आयोजित ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम का कप्तान नियुक्त किया गया था, इसमें भारत में स्वर्ण पदक प्राप्त किया था।

जयपाल सिंह मुंडा और हॉकी

जयपाल सिंह न केवल एक कुशल खिलाड़ी थे बल्कि हॉकी के प्रति उनकी गहरी रुचि और समर्पण भी उल्लेखनीय था। इनकी उत्कृष्ट खेल प्रतिभा को देखते हुए उन्हें विंबलडन हॉकी क्लब और ऑक्सफोर्डशायर हॉकी एसोसिएशन का सदस्य बनाया गया। इन्होंने भारतीय छात्रों को संगठित कर एक नई हॉकी टीम का गठन किया। 1923 से 1928 के इन्होंने बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के विश्वविद्यालयों में अपनी असाधारण हॉकी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। 1928 में इनकी कप्तानी में ही नीदरलैंड के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व किया और देश का पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलवाया लेकिन इसके तुरंत बाद ही अंग्रेज सरकार ने उनके प्रोबेशन की अवधि 1 साल के लिए और बढ़ा दी स्वयं जयपाल सिंह ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि जब वे ओलंपिक खेलकर ऑक्सफोर्ड लौटे तो उन्हें बताया गया कि बिना अनुमति अनुपस्थित रहने के कारण उनकी आई.सी.एस. प्रोबेशन अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गई। बिट्रिस सरकार के लिए भारतीय टीम के विश्वविजेता कप्तान होने का कोई महत्त्व नहीं था। लेकिन मुंडा के लिए यह बहुत बड़ी बात थी क्योंकि इन्होंने इसके विरोध में आई.सी.एस. की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ दी। जयपाल सिंह ने स्वयं इस बात का जिक्र किया कि मुझे आईसीएस और हॉकी इनमें से किसी एक चुनना था। मैंने अपने दिल की आवाज सुनी, हॉकी मेरे खून में था। मैंने फैसला किया हॉकी को चुना । इस प्रकार जयपाल सिंह ने अपने स्वाभिमान और नस्लीय भेदभाव के विरोध में हॉकी को अलविदा कह दिया और अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखा।

राजनीति के शुरुआती दिन

जयपाल सिंह मुंडा का राजनीतिक जीवन मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों के प्रति भेदभाव और शोषण से प्रेरित था। विशेषकर बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र में 1938 में आदिवासी महासभा की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य संथाल परगना और छोटानागपुर को बिहार से अलग कर एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में स्थापित करना था। 1939 में जयपाल सिंह को महासभा का अध्यक्ष चुना गया और इन्होंने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। आदिवासी समुदायों को कांग्रेस सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। इन्होंने आदिवासी श्रमिक संघ की स्थापना की। जिसका उद्देश्य जमशेदपुर के औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत आदिवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना था। जयपाल सिंह को आदिवासी संघर्षों के एक प्रमुख नेता के रूप में पहचाना गया और आदिवासियों के बीच उन्हें ‘मारंग गोमके’ यानी ‘महान नेता’ के रूप में सम्मानित किया गया। 1939 में जयपाल सिंह ने आदिवासी महासभा के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला और इसके बाद इन्होंने आदिवासी आंदोलन के लिए अपनी पूरी प्रतिबद्धता दिखाई। 1946 में, खूंटी क्षेत्र से चुनाव जीतकर वे संविधान सभा के सदस्य बने। 1950 में आदिवासी महासभा को राजनीतिक संगठन में बदलते हुए इन्होंने झारखंड पार्टी की स्थापना की, जिससे आदिवासियों की राजनीति में सक्रिय भागीदारी की शुरुआत हुई।इन्होंने भारत में आदिवासी शब्द को सम्मानित किया और अखिल भारतीय स्तर पर आदिवासी समुदायों को संगठित किया। इनके मार्गदर्शन में आदिवासी राजनीति को एक स्पष्ट और संगठित दिशा मिली।

संविधान सभा में आदिवासी हक अधिकारों की आवाज बुलंद की

1947 में जब वंचित वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए अधिकारों की रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें सिर्फ दलितों के लिए विशेष प्रावधान थे, तो जयपाल सिंह आदिवासियों के अधिकारों के लिए खड़े हुए। संविधान सभा में इन्होंने एक ऐतिहासिक भाषण में कहा, “इस देश में पिछले छह हजार सालों से अगर किसी का शोषण हुआ है, तो वह आदिवासी हैं। संविधान सभा में दिए गए अपने तमाम भाषणों में जयपाल सिंह मुंडा ने अंग्रेजों के साथ भारत की अन्य आबादी को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इसी बात को लेकर कुछ आलोचक उन पर अंग्रेजों के समर्थक होने का आरोप लगाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि ब्रिटिश सरकार ने नागपुर संथाल परगना में उनकी सबसे अधिक जासूसी कराई थी। इन्होंने आदिवासी संघर्ष को लेकर एकबार संविधान सभा में कहा था कि हमारी स्थिति का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि हम हिंदुओं या मुसलमानों से कम हैं या पारसियों से ज्यादा। हमारा दृष्टिकोण यह है कि हमारे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक मानकों में बहुत ज्यादा असमानता है, और केवल कुछ वैधानिक बाध्यता के कारण ही हम सामान्य जनसंख्या स्तर तक पहुँच सकते हैं। मैं आदिवासियों को अल्पसंख्यक नहीं मानता । उनके पास कुछ ऐसे अधिकार हैं जिन्हें कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता. हालाँकि हम उन अधिकारों की माँग नहीं कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारे साथ भी दूसरों की तरह व्यवहार किया जाए। मरंग गोमके ‘आदिवासी नायक’ की इस बात पर संविधान सभा में बहुत देर तक ताली बजी थी। आदिवासी मंत्रालय की स्थापना साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा आदिवासियों के लिए ‘पंचशील’ नीति बनाना, जयपाल सिंह की मेहनत का परिणाम था। हालांकि ये संवैधानिक प्रावधान उस रूप में लागू नहीं हो सके जैसा कि जयपाल सिंह चाहते थे । यही कारण है कि पांचवीं और छठी अनुसूची तथा ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल के होते हुए भी आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

आदिवासियों में जाति व्यवस्था नहीं, तो हमें अनुसूचित जनजाति क्यों कहा जाए ?

जयपाल सिंह के प्रयासों के बाद ही संविधान सभा ने आदिवासी समुदाय के लगभग चार सौ समूहों को विधायिका और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया । हालांकि इन्होंने इस बात का विरोध किया कि आदिवासियों को उनकी पहचान से अलग कर अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाए। इन्होंने संविधान सभा की बहस में 9 दिसंबर 1946 को कहा कि अध्यक्ष महोदय मैं उन लाखों अज्ञात लोगों की ओर से बोलने खड़ा हुआ हूं जो स्वतंत्रता संग्राम के अनजान सेनानी हैं, जो भारत के मूल निवासी हैं और जिन्हें बैकबर्ड ट्राइब्स, क्रिमिनल ट्राइब्स और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। हम आदिवासियों में जाति व्यवस्था नहीं है, तो हमें अनुसूचित जनजाति क्यों कहा जाए? हमें सिर्फ आदिवासी कहा जाए, हमें अपनी पहचान के साथ कोई समझौता नहीं चाहिए। बिहार से अलग होकर अलग जनजातीय राज्य की मांग के लिए उन्होंने सबसे पहले आवाज उठाई थी।

हॉकी स्टेडियम का नाम

झारखंड सरकार ने उनकी उपलब्धियों को उचित सम्मान देते हुए रांची में बने भव्य खेल परिसर और खेल गांव का नाम ‘जयपाल सिंह मुंडा खेल परिसर’ रखा। इसके साथ ही रांची में बने हॉकी स्टेडियम का नाम भी ‘मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा’ के नाम पर किया गया। इनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए समय समय पर लोग उनके लिए भारत रत्न की भी मांग करते हैं। अब यह देखना होगा कि क्या भाारत सरकार इनके लिए इसे स्वीकार करेगी।

शिक्षा

जयपाल सिंह मुंडा ने शुरुआती शिक्षा रांची के सैंट पॉल स्कूल से प्राप्त किया था । वहाँ के प्रधानाचार्य ने आगे की शिक्षा के लिये उन्हे इंग्लैंड भेजा । स्कूल की शिक्षा पाने के बाद इन्होंने उच्च शिक्षा ऑक्स्फर्ड विश्वविद्यालय से प्राप्त की। मिशनरीज के मदद से ऑक्सफोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज में पढ़ने के लिए गए वहां पर वे एक निराले रूप से एक प्रतिभाशाली थे। इन्हें पढ़ाई के अलावा हॉकी खेलने का शौक था। इसके अलावा वाद-विवाद में भी इन्होंने खूब नाम कमाया। सैंट पॉल के प्रधानाचार्य रेव.केकॉन कोसग्रेन ने पहचाना और वही इनके प्रारम्भिक गुरु भी थे, जिन्होंने इनको अपने समाज के उत्थान के लिये प्रेरित किया।

आदिवासियों के लिए जयपाल सिंह मुंडा योगदान

जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों के लिए बढ़-चढ़कर योगदान दिया झारखंड आंदोलन के नेता ने भारत आने के बाद ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करने के बजाय आदिवासियों के हक की लड़ाई के लिए इन्होंने 1938 में आदिवासी महासभा का गठन किया। इन्होंने बिहार से हटकर एक अलग झारखंड राज्य की मांग की। इन्होंने मध्य पूर्वी भारत में आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए आदिवासी राज्य बनाने की मांग की उनके प्रस्तावित राज्य में वर्तमान झारखंड, उड़ीसा का उत्तरी भाग, छत्तीसगढ़ और बंगाल के कुछ हिस्से भी शामिल थे। इसके बाद जयपाल सिंह ने देश में आदिवासियों के अधिकारों की आवाज बन गए। 1938 के आखिरी महीने में जयपाल ने पटना और रांची का दौरा किया। इस दौरे के दौरान आदिवासियों के खराब हालातो को देखते हुए जयपाल सिंह मुंडा ने राजनीति में आने का फैसला किया।

पहले आदिवासी जिनका भारतीय प्रशासनिक सेवा में हुआ चयन

खेल के प्रति समर्पित होने के कारण 22 साल की उम्र में इनको विंबलडन हॉकी क्लब और ऑक्सफोर्ड शायर हॉकी एसोसिएशन का सदस्य बनाया गया था। इसके बाद इन्होंने भारतीय छात्रों को मिलाकर उन्होंने हॉकी टीम बनाई। अपने खेल के साथ ही उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (ICS) के इंटरव्यू को भी क्वालीफाई कर लिया था। जयपाल सिंह मुंडा पहले आदिवासी थे जो भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए थे।

हॉकी के मोह में सिविल सेवा से दिया त्यागपत्र

1928 में एक प्रोबेशनरी ICS अधिकारी के रूप में इंग्लैंड में ट्रेनिंग लेते समय, उन्हें एम्स्टर्डम में समर ओलिंपिक के लिए भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी के लिए बुलावा आया था। 1928 में भारतीय हॉकी टीम पहली बार ओलिंपिक खेलों में भाग लेने वाली थी। अब जयपाल को ICS की नौकरी और ओलिंपिक में भारत के प्रतिनिधित्व को चुनना था। इन्होंने हॉकी के मोह में सिविल सेवा से त्यागपत्र दे दिया और भारत को मेडल दिलाने के लिए रवाना हो गए।

‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय

3 जनवरी, 1903 को तब के बिहार (अब झारखंड) के खूंटी जिले के गांव तकरा पाहनटोली में एक आदिवासी परिवार में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा कम उम्र में ही अपने गांव में मिशनरियों के ध्यान में आ गए। इनके परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया था। रांची में इनके स्कूल, सेंट पॉल के प्रिंसिपल ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया और आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भेज दिया। जयपाल ब्रिटेन में ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय छात्र थे।

1928 में भारत ने जीता ओलिंपिक में पहला गोल्ड मेडल

जयपाल सिंह मुंडा ने​​​​​​​ एम्स्टर्डम ओलिंपिक में भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की और 1928 में देश को ओलिंपिक के इतिहास में पहला गोल्ड मेडल हासिल हुआ। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने लीग चरण में 17 मैच खेले, जिनमें से 16 जीते और एक ड्रा रहा।

 

चुनाव जीतकर पहुंचे सविंधान सभा

जयपाल सिंह मुंडा एक कुशल वक्ता थे। उनमें संगठनकर्ता, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, संपादक, लेखक, शिक्षाविद, समाज सुधारक और प्रशासक जैसे गुण मौजूद थे। उन्हें अपनी मातृभाषा मुंडारी के अलावा कई भाषाओं की अच्छी समझ थी। इनमें अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, इटालियन, हिन्दी और नागपुरी भाषा शामिल थी। इसी समझ और वाकपटुता के चलते 1946 में खूंटी ग्रामीण क्षेत्र से चुनाव जीतकर संविधान सभा के सदस्य बने।

मरंग गोमके का क्या अर्थ है?

जिन्हें आदर से झारखंड के आदिवासी उन्हें ‘मरङ गोमके’ (सर्वोच्च अगुआ/ नेता) कहते हैं।

मुंडा का इतिहास क्या है?

मुंडा सुंदरबन के शाही बंगाल टाइगर साम्राज्य की एक जातीय समुदाय हैं। इन्हें ‘सरना/बुनो/कुली/होरोको’ कहा जाता है और ये मूल निवासी हैं। ब्रिटिश काल में, वे रांची से बांग्लादेश आए और तब से यहीं रह रहे हैं । वे धर्म और संस्कृति का पालन करते हैं।

मुंडाओं का इतिहास क्या है ?
झारखंड के छोटानापुर में जब मुंडा के गांव किलि के हिसाब से बसने लगे तो, पड़हा की शुरुआत हुई. एक पड़हा के लोग सामाजिक और प्रशासनिक रूप से जुड़े होते थे, इसलिए उनका एक राजा भी होता था. पड़हा राजा के बाद महाराजा होते थे, इतिहास में जिस मदरा मुंडा का जिक्र है, वह मुंडाओं के महाराजा ही थे।

मुंडा नाम के पीछे का इतिहास क्या है ?

रॉबर्ट पार्किन बताते हैं कि “मुंडा” शब्द ऑस्ट्रोएशियाई शब्दकोश का हिस्सा नहीं था और इसकी उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। आर.आर. प्रसाद के अनुसार, “मुंडा” नाम संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है “मुखिया” । यह हिंदुओं द्वारा दिया जाने वाला एक सम्मानजनक नाम है और इसलिए यह एक जनजातीय नाम बन गया।

मुंडा जाति क्या है ?

मुण्डा जनजाति दक्षिण – पूर्व एशिया में केंद्रित आस्ट्रॉलॉयड (आग्नेय) प्रजाति परिवार की एक विशिष्ट जाति है, जो बिहार, झारखण्ड, बंगाल, मध्यप्रदेश, उडिसा तथा त्रिपुरा में निवास करती है

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