कारोई-सेथुरिया रोड बना मौत का कुआं: बारिश में गड्ढे बने स्विमिंग पूल, एंबुलेंस भी फंस रही, ग्रामीण बोले – “ये सड़क है या सजा?”

PWD और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से टूटा 5 किमी का मार्ग

स्कूली बच्चे, किसान और मरीज सबसे ज्यादा परेशान

सेथुरिया के मदन गुर्जर: “आपातकाल में भी घंटों लग जाते हैं”

गुरला:- विकास के दावों पर पानी फिरा विकसित भारत” और “सड़क से जुड़ा हर गांव” के बड़े-बड़े दावों के बीच भीलवाड़ा जिले का एक सच आज भी कीचड़ और गड्ढों में फंसा हुआ है। ये सच है कारोई से सेथुरिया को जोड़ने वाली लगभग 5 किलोमीटर लंबी सड़क का।
आपके द्वारा भेजी गई तस्वीर इसी सड़क की है। तस्वीर में साफ दिख रहा है कि डामर उखड़ चुका है, जगह-जगह गहरे गड्ढे हैं और उनमें बारिश का गंदा पानी भरा हुआ है। पुलिया के पास की स्थिति तो और भी भयावह है। सड़क के दोनों तरफ की दीवारें टूटी हुई हैं और बीच में पानी का तालाब बन गया है। देखने पर लगता ही नहीं कि ये कोई सड़क है। लगता है जैसे कोई बरसाती नाला हो।
मानसून की पहली बारिश ने ही इस सड़क की पोल खोल दी है। अब यहां से गुजरने वाला हर व्यक्ति भगवान का नाम लेकर ही निकलता है। सड़क नहीं, स्विमिंग पूल है हमारी टीम ने जब मौके पर जाकर जायजा लिया तो स्थिति और बदतर मिली।

पुलिया के पास का हाल:

पुलिया के आसपास लगभग 100 मीटर तक सड़क पूरी तरह धंस गई है। डामर के नाम पर सिर्फ कंकड़ और मिट्टी बची है। बारिश का पानी यहां रुक जाता है क्योंकि निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। नतीजा – 1 से 1.5 फीट तक गहरे पानी का जमाव। दोपहिया वाहन चालक तो यहां गिरते-पड़ते नजर आते हैं।

किसानों की पीड़ा:

इस मार्ग से आसपास के 6-7 गांवों के किसान अपने खेतों पर दिन में दो चार बार आना जाना रहता है ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर निकलना खतरे से खाली नहीं।

स्कूली बच्चों की मजबूरी:

सेथुरिया और आसपास के गांवों के बच्चे पढ़ने के लिए कारोई जाते हैं। बरसात में उनके जूते-यूनिफॉर्म कीचड़ से सन जाते हैं। कई बार बसें भी इस रास्ते से आने से मना कर देती हैं।

ग्राम पंचायत सेथुरिया के उप सरपंच नश मदन गुर्जर ने गुस्से और दर्द के साथ बताया: एंबुलेंस भी नहीं निकलती है । इस मार्ग की सबसे बड़ी त्रासदी आपातकाल में सामने आती है।

साहब, बीमारी-एक्सीडेंट का कोई टाइम थोड़ी होता है ये सड़क नहीं है, ये मौत को दावत देना है। गर्भवती महिला, हार्ट का मरीज, एक्सीडेंट वाला – कोई भी हो, यहां फंसना तय है। हम ग्राम पंचायत व PWD ऑफिस के कही बार चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनता ही नहीं।”

आर्थिक नुकसान: करोड़ों का

ये सिर्फ आवागमन की समस्या नहीं है, ये सीधे लोगों की जेब पर असर डाल रही है।सब्जी, दूध, अनाज समय पर मंडी नहीं पहुंच पाता। आधा रास्ते में खराब हो जाता है।.

वाहनों की टूट-फूट:

हर महीने बाइक, कार, ट्रैक्टर की मरम्मत पर 3-4 हजार का अतिरिक्त खर्च।

जिम्मेदार कौन? PWD की लापरवाही

स्थानीय लोगों का साफ आरोप है कि विभाग हर साल बजट में “मरम्मत” के नाम पर पैसा लेता है, लेकिन काम जीरो होता है।

जनप्रतिनिधियों से शिकायत, कोई सुनवाई नहीं

गांव वालों ने ग्राम पंचायत सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और विधायक को कई बार लिखित और मौखिक शिकायत दी। लेकिन कोई सुनवाई नहीं चुनाव के बाद सब भूल गए। ग्रामीण ने कहा की – _”वोट मांगने आते हैं तो कहते हैं ‘सड़क पक्की करवा देंगे’। जीतने के बाद फोन भी नहीं उठाते।”
युवाओं का कहना है – _”अब और नहीं सहेंगे। हमें विकास नहीं चाहिए, हमें बस चलने लायक सड़क चाहिए।”

सड़क अधिकार है, एहसान नहीं

एक अच्छी सड़क सिर्फ ईंट-डामर का टुकड़ा नहीं होती। वो जीवन रेखा होती है। उससे बच्चों का स्कूल जुड़ा है, किसान की मंडी जुड़ी है, मरीज का अस्पताल जुड़ा है। कारोई-सेथुरिया की ये सड़क आज चीख-चीख कर बता रही है कि जमीनी स्तर पर विकास के दावे कितने खोखले हैं। फोटो में दिख रहा हर गड्ढा, हर कीचड़ का तालाब सरकार और सिस्टम से सवाल पूछ रहा है।

अब जरूरत है तुरंत कार्रवाई की। वरना वो दिन दूर नहीं जब इस सड़क की लापरवाही किसी की जान लेगी। और तब सिर्फ अफसोस और मुआवजे की घोषणा से काम नहीं चलेगा। सरकार से, PWD से और जनप्रतिनिधियों से सेथुरिया कारोई क्षेत्र की जनता की एक ही मांग है – “हमें भाषण नहीं, सड़क चाहिए।”