किरण ने बिखेरा जीत का उजियारा, अब विकास की नई किरण बनने की बारी!

140 मतों से सरपंच बनीं किरण राठौड़, श्वसुर स्व. महेंद्र प्रताप सिंह राठौड़ की विकासवादी विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती

 

मेहरू कलां

स्मार्ट हलचल|ग्राम पंचायत मेहरू कलां में सरपंच पद के चुनाव परिणाम के साथ ही गांव की नई नेतृत्वकारी पारी की शुरुआत हो गई है। किरण राठौड़ ने अपने प्रतिद्वंद्वी को 140 मतों से पराजित कर सरपंच पद पर जीत दर्ज की। उनकी इस जीत के साथ ही गांव में विकास की उस विरासत को आगे बढ़ाने की उम्मीदें भी जुड़ गई हैं, जिसकी पहचान कभी उनके श्वसुर स्वर्गीय महेंद्र प्रताप सिंह राठौड़ के नाम से हुआ करती थी। महेंद्र प्रताप सिंह राठौड़ गांव में तीन बार सरपंच रह चुके थे और अपने निर्भीक व्यक्तित्व, बेबाक कार्यशैली तथा विकास के प्रति समर्पण के लिए पहचाने जाते थे। वहीं, किरण राठौड़ के पति चंद्रवीर सिंह राठौड़ भी उपसरपंच पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा चुके हैं। ऐसे में किरण की जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि गांव की राजनीति में एक ऐसे परिवार की विकास संबंधी विरासत से जुड़ी उम्मीदों का नया अध्याय भी है, जिसने पंचायत के नेतृत्व में अपनी भूमिका निभाई है।
किरण राठौड़ के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं के भरोसे पर खरा उतरने की होगी। चुनाव में मिली जीत जहां उनके लिए सम्मान और गौरव का विषय है, वहीं यह जिम्मेदारी भी कम नहीं है कि वे गांव के लोगों की अपेक्षाओं को धरातल पर उतारें। ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंच का पद केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांव की बुनियादी सुविधाओं, सामाजिक समरसता और विकास की दिशा तय करने में भी इसकी अहम भूमिका होती है। सड़क, नाली, पेयजल, स्वच्छता, रोशनी, सरकारी योजनाओं का लाभ और जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुंचाना ऐसे विषय हैं, जिन पर ग्रामीणों की निगाहें नए नेतृत्व पर टिकी रहती हैं।
स्वर्गीय महेंद्र प्रताप सिंह राठौड़ का नाम मेहरू कलां में एक ऐसे सरपंच के रूप में लिया जाता रहा है, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान विकास कार्यों को प्राथमिकता दी। तीन बार सरपंच रहने के अनुभव और निर्भीक कार्यशैली के चलते उनकी गांव में अलग पहचान बनी थी। उन्हें विकास पुरुष के रूप में याद किया जाता है। उनके कार्यकाल में हुए विकास कार्यों की चर्चा आज भी उनके समर्थकों और ग्रामीणों के बीच होती है। यही वजह है कि किरण राठौड़ की जीत के बाद अब गांव में यह सवाल भी चर्चा का विषय बन रहा है कि क्या वे अपने श्वसुर के पदचिह्नों पर चलते हुए उसी विकासवादी परंपरा को आगे बढ़ा पाएंगी?
किरण के पति चंद्रवीर सिंह राठौड़ का उपसरपंच के रूप में अनुभव भी पंचायत के कामकाज को समझने में सहायक हो सकता है। हालांकि, पंचायत की जिम्मेदारी संभालने के बाद किरण की अपनी कार्यशैली, निर्णय क्षमता और ग्रामीणों के प्रति व्यवहार ही उनकी वास्तविक पहचान तय करेंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरासत रास्ता दिखा सकती है, लेकिन जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए निरंतर काम करना पड़ता है। ऐसे में किरण के सामने अपने परिवार की राजनीतिक पहचान को आगे बढ़ाने के साथ-साथ अपनी अलग पहचान स्थापित करने का भी अवसर है।
गांव की राजनीति में चुनावी जीत का उत्साह कुछ दिनों में सामान्य हो जाता है, लेकिन विकास कार्यों का असर लंबे समय तक लोगों की जिंदगी में दिखाई देता है। ग्रामीणों को उम्मीद रहेगी कि नई सरपंच गांव की समस्याओं को प्राथमिकता देंगी, आमजन की सुनवाई सुनिश्चित करेंगी और विकास कार्यों में पारदर्शिता तथा निष्पक्षता को महत्व देंगी। गांव के प्रत्येक व्यक्ति को साथ लेकर चलना, आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर निर्णय लेना और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाना किसी भी सफल सरपंच की पहचान मानी जाती है।
140 मतों से मिली जीत ने किरण राठौड़ को गांव की सेवा का अवसर दिया है। अब देखना यह होगा कि वे इस जनादेश को विकास के संकल्प में किस तरह बदलती हैं। क्या मेहरू कलां को फिर निर्भीक नेतृत्व और विकास कार्यों की नई पहचान मिलेगी? क्या किरण अपने श्वसुर स्वर्गीय महेंद्र प्रताप सिंह राठौड़ की विकासवादी विरासत को आगे बढ़ाते हुए गांव की उम्मीदों पर खरी उतरेंगी? इन सवालों का जवाब आने वाला समय और उनके कार्यकाल में होने वाले काम देंगे। फिलहाल, जीत का सेहरा किरण के सिर बंध चुका है और अब ग्रामीणों की निगाहें उनके कार्यों पर रहेंगी।