शाहपुरा (भीलवाड़ा)
जिस उम्र में इंसान को सहारे और संवेदनशील व्यवस्था की जरूरत होती है, उसी उम्र में शाहपुरा के पेंशनर्स सरकारी व्यवस्था की उदासीनता का दर्द झेलने को मजबूर हैं। सरकार की आरजीएचएस (राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम) योजना, जिसे कर्मचारियों और पेंशनर्स के स्वास्थ्य सुरक्षा कवच के रूप में लागू किया गया था, अब क्षेत्र में कागज़ों तक सिमटती नजर आ रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि बुजुर्ग मरीज इलाज की आस लेकर अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन राहत कहीं दिखाई नहीं दे रही। कहावत है कि “डूबते को तिनके का सहारा भी काफी होता है”, लेकिन यहां तो तिनका भी नसीब नहीं हो रहा। डॉक्टरों की अनुपलब्धता ने पूरी व्यवस्था की सच्चाई उजागर कर दी है। जिन चिकित्सकों के भरोसे पेंशनर्स दवाई और उपचार प्राप्त कर रहे थे, उन्हें भी नोटिस जारी कर दवाई लिखने से मना कर दिया गया, जिससे मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ गई है। अब स्थिति यह है कि योजना का नाम तो है, लेकिन सुविधा का अस्तित्व नजर नहीं आता।
व्यवस्था की हालत “न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी” जैसी हो चुकी है। योजना का ढोल तो खूब पीटा गया, मगर जमीन पर सुविधाएं ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं। जिम्मेदार विभाग मानो कानों में तेल डालकर बैठा है और पेंशनर्स बेबस निगाहों से राहत की उम्मीद लगाए हुए हैं। उम्र और बीमारी के बीच यह संघर्ष उनके लिए किसी सजा से कम नहीं लग रहा।
पेंशनर्स का दर्द उनकी बातों में साफ झलकता है। उनका कहना है कि जीवन भर सरकार की सेवा करने के बाद आज इलाज के लिए भटकना सबसे बड़ी विडंबना है। जब शरीर जवाब देने लगे और दवाइयों की जरूरत बढ़ जाए, तब व्यवस्था का मुंह मोड़ लेना मन को तोड़ देता है। कई बुजुर्गों ने भावुक होकर कहा कि अब समझ नहीं आता अपनी पीड़ा किसे सुनाएं, क्योंकि सुनने वाला कोई नजर नहीं आता।
“दवा की आस में निकले थे घर से हम मगर,
लाइनें मिलीं, बंद दरवाज़े और इंतज़ार मिला,
जिस योजना को सहारा समझ बैठे थे हम,
वहीं से हर बार बेबसी का उपहार मिला।”
स्थानीय कर्मचारियों और पेंशनर्स ने प्रशासन से जल्द व्यवस्था सुधारने की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि आरजीएचएस योजना को प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया तो मजबूर होकर आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जीवन भर व्यवस्था को संभालने वाले पेंशनर्स को अपने ही हक के इलाज के लिए कब तक इंतजार करना पड़ेगा।
