कोटा।स्मार्ट हलचल|हाड़ौती की पारंपरिक शिल्प विरासत को राष्ट्रीय राजधानी में नई पहचान मिली है। नई दिल्ली में आयोजित “ज्वेल्स ऑफ़ इंडिया – भारत की शान, भारत का अभिमान” समारोह में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कोटा की ‘सोनचिरैया’ ब्रांड की सह-संस्थापक प्रीति सिंह पारीक को कोटा की पारंपरिक ज़री साड़ी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित पहचान दिलाने के लिए सम्मानित किया।
यह मंच भारतीय उद्यमशीलता, सांस्कृतिक अस्मिता और वैश्विक प्रभाव को रेखांकित करने वाली विशिष्ट उपलब्धियों का सम्मान करता है। समारोह में देश-विदेश की 29 चुनिंदा हस्तियों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की छाप विश्व पटल पर अंकित की है। प्रीति सिंह को मिला यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि कोटा की बहू के रूप में शहर के लिए गर्व का क्षण भी है।
कान्स के रेड कार्पेट पर बिखरी कोटा ज़री की आभा
कोटा की पारंपरिक ज़री साड़ी अब वैश्विक फैशन और सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। फ्रांस में आयोजित प्रतिष्ठित Cannes Film Festival में यह साड़ी दो बार रेड कार्पेट पर आकर्षण का केंद्र बनी। मास्टरकार्ड के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर की पत्नी ज्योति राजामन्नार ने कोटा ज़री साड़ी धारण कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसकी गरिमा को नई ऊंचाई दी।
इसके अतिरिक्त राधिका राजे गायकवाड़, अंबिका राजे, रश्मि राजे, टीना अंबानी सहित कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने विभिन्न भव्य आयोजनों में कोटा ज़री साड़ी को अपनाकर इसकी शान बढ़ाई है। उद्योग जगत से जुड़े नामों की सहभागिता ने भी इस पारंपरिक परिधान को आधुनिक वैश्विक पहचान दिलाने में भूमिका निभाई है।
कैथून की करघों से उठती परंपरा की ध्वनि
कोटा के निकट स्थित कैथून कस्बा ज़री बुनाई की आत्मा माना जाता है। वर्ष 2017 में स्थापित ‘सोनचिरैया’ ने 2020 में कैथून के विशेषज्ञ शिल्पकारों के साथ मिलकर इस पारंपरिक कला के पुनरुद्धार का अभियान प्रारंभ किया।
सोने और चांदी के महीन तारों से हाथों द्वारा बुनी जाने वाली ज़री साड़ी को तैयार करने में तीन माह से अधिक का समय लगता है। यह केवल परिधान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित कौशल, धैर्य और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। वर्तमान में 2000 से अधिक कारीगर इस शिल्प परंपरा से जुड़े हैं और इसे जीवित रखने का दायित्व निभा रहे हैं।
प्रीति सिंह पारीक का कहना है कि उद्देश्य केवल फैशन का विस्तार नहीं, बल्कि उस कला को पुनर्जीवित करना है, जो समय के साथ लुप्तप्राय होती जा रही थी। उनका प्रयास है कि दुनिया देखे—कैथून की गलियों में आज भी सदियों पुरानी बुनाई परंपरा सजीव है।
कोटा की ज़री साड़ी को मिला यह राष्ट्रीय सम्मान वस्तुतः उन कारीगरों की मेहनत का सम्मान है, जिनके करघों की थाप से इतिहास, संस्कृति और सौंदर्य की एक अद्वितीय गाथा बुनी जाती है। दिल्ली में गूंजी यह गूंज अब वैश्विक परिदृश्य में कोटा की पहचान को और सशक्त करेगी।










