भैरू चौधरी
कोटड़ी । भीलवाड़ा जिले के कोटड़ी, पारोली, बीगोद और बडलियास क्षेत्र से सामने आया अवैध गारनेट खनन और “बंदी” वसूली का मामला अब सिर्फ एक FIR तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसे संगठित तंत्र की तस्वीर पेश कर रहा है, जो कहीं न कहीं उस दौर की याद दिलाता है जब अंग्रेजों ने भारत को लूटने के लिए अपने एजेंट और अधिकारी तैनात कर रखे थे—तो क्या यहां भी कुछ वैसा ही “कलेक्शन मॉडल” चल रहा था, जहां तय होता था कि कौन काम करेगा और किससे कितना वसूला जाएगा?FIR के अनुसार अजय पांचाल, नंदसिंह उर्फ पिन्टू सिंह, नारायण गुर्जर और कालू गुर्जर ने मिलकर गिरोह बनाकर गारनेट का काम करने वालों को डरा-धमकाकर प्रति मशीन ₹30-30 हजार की मासिक “बंदी” देने को मजबूर किया, और शंकर लाल गुर्जर, राजू वैष्णव, चैन सिंह, सोहन जाट, धन्ना लाल गुर्जर, विजय गुर्जर, कालू गुर्जर, रामचन्द्र गुर्जर, देवकिशन गुर्जर, छोटू लाल गुर्जर सहित 15–20 अन्य लोगों से वसूली का जिक्र इस बात को मजबूत करता है कि यह कोई छोटा खेल नहीं बल्कि गहराई तक फैला हुआ नेटवर्क था।सबसे बड़ा और सबसे गंभीर सवाल यही है—जिसका जिक्र FIR में किया गया कि इस पूरे खेल की जानकारी खुद बीट कांस्टेबल और आसूचना अधिकारी के जरिए सामने आई और मुखबिर से पुष्टि भी हुई, तो क्या यह मान लिया जाए कि सिस्टम को इसकी भनक थी? अगर हां, तो क्या कोटड़ी, पारोली और बीगोद थानों के थाना अधिकारी, बिट प्रभारी और आसूचना तंत्र इस पूरे “बंदी राज” से अनभिज्ञ थे, या फिर कहीं न कहीं वही भूमिका निभाई जा रही थी, जैसी कभी अंग्रेजों के समय उनके स्थानीय एजेंट निभाते थे?हालांकि, जैसे ही मामला जिला पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह यादव तक पहुंचा, उन्होंने तुरंत संज्ञान लेकर स्पेशल टीम को सक्रिय किया और चारों आरोपियों को धर दबोचा— यह कार्रवाई यह जरूर दिखाती है कि इच्छाशक्ति हो तो माफिया तंत्र पर तुरंत चोट की जा सकती है , लेकिन अब कहानी एक नए मोड़ पर खड़ी है।क्योंकि *DST प्रभारी आईपीएस माधव उपाध्याय की भूमिका भी सवालों के घेरे में आने के बाद एसपी द्वारा जांच बैठाना इस बात का संकेत देता है कि मामला अब केवल माफिया या दलालों तक सीमित नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर तक पहुंच सकता है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह पूरा “बंदी राज” एक संगठित लूट मॉडल बन चुका था, जहां नीचे से लेकर ऊपर तक हिस्सेदारी तय थी? क्या कोई बड़ा चेहरा अब भी पर्दे के पीछे है? और क्या यह जांच उस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करेगी, या फिर इतिहास की तरह कुछ नाम सामने आकर बाकी परतें फिर से दबी रह जाएंगी? भीलवाड़ा का यह मामला अब सिर्फ अवैध खनन का नहीं, बल्कि एक सीधा सवाल है—क्या यहां भी ‘कम्पनी राज’ की तरह लूट का सिस्टम खड़ा हो चुका था, और क्या अब सच में उसका अंत होगा?
