फाल्गुन पूर्णिमा के दिन थम गई भक्ति की वह मधुर वाणी, क्षेत्र में शोक की लहर…
जिसने गांव-गांव देवनारायण भगवान की महिमा का गुणगान किया, वह लोक साधक अब स्मृतियों में…बसे
शाहपुरा@(किशन वैष्णव)राजस्थान की लोक संस्कृति में कथा-वाचन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति की जीवंत धारा है। जब गांवों में भगवान देवनारायण जी की फड़ सजती है और ढोलक-मंजीरों की मधुर धुन के साथ कथा का वाचन होता है, तो वातावरण श्रद्धा और भक्ति से भर उठता है। इसी लोक परंपरा को वर्षों तक जीवित रखने वाले ग्राम खामोर के स्थानीय लोक कथा वाचक स्व. माधु लाल करेसिया अब हमारे बीच नहीं रहे।
3 मार्च 2026, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन उनके देवलोक गमन की खबर जैसे ही क्षेत्र में फैली, खामोर सहित आसपास के गांवों में शोक की लहर दौड़ गई। होली और फाल्गुन पूर्णिमा जैसे पावन पर्व के दिन एक ऐसे लोक कलाकार का जाना लोगों को गहरे भावुक कर गया। सच में, ऐसा लगा जैसे लोक कथा की वह अमरबेल टूट गई, जिसकी छाया में वर्षों से श्रद्धालु भक्ति का रस पाते रहे थे।
माधु लाल करेसिया एक स्थानीय लोक कलाकार और कथा वाचक थे, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भगवान देवनारायण जी की कथा सुनाने और उनकी महिमा को जन-जन तक पहुंचाने में समर्पित कर दिया। उनकी वाणी में ऐसी मिठास और भावनाओं में ऐसी गहराई थी कि जब वे कथा सुनाते, तो श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते रह जाते।जब भी किसी गांव में देवनारायण भगवान की कथा होती और माधु जी फड़ के सामने बैठकर वाचन प्रारंभ करते, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता। ढोलक और मंजीरों की ताल के साथ उनकी आवाज़ दूर-दूर तक गूंजती थी। वे भगवान देवनारायण के जन्म प्रसंग,सवाई भोज और 24 बगड़ावत वीरों की शौर्य गाथा, तथा भगवान के चमत्कारों को इतनी भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करते कि श्रोता मानो उस पौराणिक काल में पहुंच जाते। कथा के बीच-बीच में उनके गाए हुए लोक भजन श्रद्धालुओं को भक्ति के रस में डुबो देते थे।
माधु जी ने केवल भीलवाड़ा जिले तक ही अपनी कथा सीमित नहीं रखी, बल्कि राजस्थान के कई जिलों में जाकर भगवान देवनारायण की अमृतवाणी का गुणगान किया। उनकी कथा सुनने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते थे और उनकी भक्ति से भरी वाणी लोगों के मन में भगवान देवनारायण के प्रति गहरी आस्था जगा देती थी।भगवान देवनारायण के प्रति उनकी आस्था केवल कथा-वाचन तक ही सीमित नहीं थी। बताया जाता है कि एक बार खेत में हंकाई के दौरान भगवान देवनारायण के पावन नमूने प्रकट हुए, जिसे उन्होंने ईश्वरीय संकेत मानते हुए वहां विधि-विधान के साथ भगवान देवनारायण की स्थापना करवाई। आज भी वह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है।माधु लाल की सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उन्होंने स्थानीय स्तर पर रहकर भी भगवान देवनारायण की महिमा को गांव-गांव तक पहुंचाया। वे धार्मिक आयोजनों, जागरणों और कथा कार्यक्रमों में जाकर लोगों को धर्म, भक्ति और सदाचार का संदेश देते थे। उनकी सादगी, विनम्रता और समाज के प्रति समर्पण ने उन्हें लोगों के दिलों में विशेष स्थान दिलाया।
आज उनके देवलोक गमन के साथ क्षेत्र ने एक ऐसे लोक कलाकार को खो दिया है, जिसने अपनी वाणी से वर्षों तक भक्ति का दीप जलाए रखा।
माधु जी करेसिया का देवलोक गमन भले ही लोक संस्कृति के लिए एक बड़ी क्षति है, लेकिन भगवान देवनारायण की महिमा के लिए उनका समर्पण, उनकी साधना और उनकी मधुर वाणी की स्मृतियां लोगों के बीच हमेशा जीवित रहेंगी। उनके द्वारा सुनाई गई कथाएं और भक्ति का संदेश आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करता रहेगा।अंत में बस यही भाव मन में उठता है“फाल्गुन की पूर्णिमा पर भक्ति की एक ज्योति बुझ गई,पर उसकी रोशनी सदा लोक मन में जगमगाती रहेगी।
माधु जी की वाणी भले ही शांत हो गई,
पर देवनारायण भगवान की महिमा में उनका योगदान सदैव अमर रहेगा।
