विधायक की हनक ले डूबेगी भाजपा की लुटिया? मांडलगढ़ और बीगोद में बागियों की बगावत से फूंका ‘सियासी लालटेन’, नाक बचाने को बागियों की चौखट पर झुकने की नौबत!

जीतने वालों को ठेंगा, चहेतों को रेवड़ियां: अवैध बजरी, ट्रांसफर उद्योग और नौकरशाही की धमकियों से भड़की जनता; 16 निर्दलीयों के चक्रव्यूह में फंसा मांडलगढ़!

मांडलगढ़/बीगोद (स्मार्ट हलचल)

मांडलगढ़, बीगोद और बिजौलियां नगर पालिका चुनाव में इस बार मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि ‘विधायक की मनमानी बनाम आक्रोशित कार्यकर्ता व जनता’ बन चुका है। सत्ता के कथित अहंकार, अपने चहेतों को उपकृत करने वाले टिकट वितरण और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने भाजपा के परंपरागत गढ़ में ही बारूद बिछा दिया है। मांडलगढ़ और बीगोद में असंतोष का ऐसा ज्वालामुखी फूटा है कि समर्पित कार्यकर्ताओं की हताशा अब निर्दलीय बगावत की फौज बनकर सीधे सत्ताधीशों की चौखट को चुनौती दे रही है।

अवैध बजरी, ट्रांसफर का खौफ और ‘सुविधा-स्वार्थ’ का टिकट

चुनावी चौपालों पर जन चर्चा गर्म है कि विधायक की कार्यशैली ने पूरे क्षेत्र में पार्टी की साख पर गहरा आघात किया है। विकास के नाम पर कागजी घोड़े, अवैध बजरी पर कथित दबदबे, कर्मचारियों को एपीओ करने और ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर दबाव बनाने तथा नौकरशाही के खुले दुरुपयोग से जनता पहले ही परेशान थी। रही-सही कसर टिकट वितरण ने पूरी कर दी। जीतने वाले जिताऊ कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर केवल निजी सुविधा और स्वार्थ के आधार पर टिकट बांटे गए, जिससे कार्यकर्ता अब खुलकर बगावत के मैदान में हैं।

🔥 मांडलगढ़ का गणित: नाक बचाने के लिए बागियों के सामने टेकने पड़ेंगे घुटने?

मांडलगढ़ के 20 वार्डों में से एक समूह विशेष द्वारा 16 वार्डों में सामूहिक रूप से उतारे गए निर्दलीय प्रत्याशी भाजपा के लिए काल बन चुके हैं। नेतृत्वहीन कांग्रेस मुकाबले से बाहर दिख रही है, ऐसे में यदि ये निर्दलीय बाजी मारते हैं तो विधायक महोदय को अपनी राजनीतिक साख (नाक) बचाने के लिए मजबूरी में इन्हीं बागियों के सामने समझौता करना पड़ेगा। केवल मुंह चमकाने के लिए ‘भाजपा समर्थित बोर्ड’ का तमगा लगाया जाएगा, जबकि हुकूमत इसी तीसरे गुट की चलेगी!

बीगोद में भी ‘अघोषित सर्जिकल स्ट्राइक’ की तैयारी

बीगोद नगर पालिका में भी टिकट वितरण की मनमानी ने भाजपा के पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी है। टिकट न मिलने से हताश कार्यकर्ता जहां सीधे निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं जो मैदान में नहीं उतरे हैं, वे अंदरखाने अघोषित तरीके से निर्दलीयों को जिताने में जुट गए हैं। एक तरफ प्रत्याशियों का अपना निजी वोट बैंक है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी का परंपरागत वोटर विधायक की कार्यशैली से नाराज होकर विकल्प तलाश रहा है।

मतदाता के तराजू पर तौलेगा अहंकार

कांग्रेस में भी टिकटों को लेकर खींचतान है, लेकिन भाजपा में मची बगावत की आग बेकाबू हो चुकी है। अब देखना यह है कि मांडलगढ़ और बीगोद का मतदाता नेताओं की हनक और निजी स्वार्थ की सियासत को खारिज करता है या बगावत की यह लहर सत्ताधीशों के सियासी तख्त को पूरी तरह उखाड़ फेंकती है।