दशहरा मेला अव्यवस्था का शिकार: लाखों रुपए फूंके फिर भी अव्यवस्था का आलम
लेजर शो से लेकर मंच तक कुप्रबंधन; कवियों को इंतजार, दर्शकों को निराशा
मंच पर राजनीतिक कचरा साफ होने तक कवि और हजारों दर्शक रहे परेशान
लाखोँ पर झाड़ू फेरा
मांडलगढ़, स्मार्ट हलचल. नगर पालिका मांडलगढ़ द्वारा आयोजित तीन दिवसीय दशहरा मेला इस बार भी अव्यवस्थाओं और कुप्रबंधन की भेंट चढ़ गया। लाखों रुपये के बजट और बड़े-बड़े दावों के बावजूद मैदान से मंच तक हर जगह अफरा-तफरी का माहौल रहा। दर्शक, जिनके लिए कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, वे सबसे अधिक परेशान दिखाई दिए।
अगर एलईडी कैमरा वाले उनके उपकरणों को सही से मजबूती से नहीं लगाये, तो भीड़ उनको तोड़ ही दे, ऐसा अनुशासनहीनता का आलम रहता है और संभालने वाले जिम्मेदार कुर्सियां लेकर डांस का आनंद ले रहे होते हैं.
नगर पालिका कर्मचारी जिनको व्यवस्था के लिए वहां लगाया जाता है, गले में बैच भी होता है, उसके बावजूद वीआईपी की तरह चेयर लेकर स्टेज के सामने ऐसे बैठते हैं जैसे विशेष आमंत्रित करके उनको बुलाया हो।
लेजर शो ने बढ़ाई परेशानी
जिस लेजर शो के नाम पर भारी खर्च किया गया, वह दर्शकों को रोमांचक अनुभव देने के बजाय अंधेरे और असुविधा का कारण बन गया। कुछ लाइटें टिमटिमाईं और बाकी समय मैदान में अंधेरा छाया रहा। बच्चे इधर-उधर भागते नजर आए, माता-पिता की सांसें अटक गईं और इस स्थिति का अपराधियों व शरारती तत्वों ने सुकून से फायदा उठाया।
आतिशबाजी और रावण दहन भी फीका
मेले का मुख्य आकर्षण रावण दहन और आतिशबाजी महज दो मिनट में निपट गया। हल्की-फुल्की आतिशबाजी से हजारों रुपए का धुआं उड़ गया। हर साल की तरह इस बार भी दर्शकों को उम्मीद के मुताबिक रोमांचक दृश्य नहीं मिल पाए।
राजनीतिक कचरा इतना हो गया कि कवियों के स्टेज पर आने से पहले झाड़ू लगाना पड़ा

मंच पर अव्यवस्था चरम पर रही। संचालक कौन है, कार्यक्रम कौन चला रहा है, यह तक समझ नहीं आया। माइक कभी किसी के हाथ में तो कभी किसी के हाथ में चला जाता। मंच पर छोटे-बड़े नेता, कार्यकर्ता और पदाधिकारी की भीड़ रही। सम्मान और आयोजन पीछे छूट गए और माहौल फोटोग्राफी प्रतियोगिता जैसा नजर आने लगा। सामने जनता बैठे-बैठे तमाशा देखती रहती है और बोर होती है।
कवि सम्मेलन के लिए पहुंचे कवियों को लंबे समय तक मंच के नीचे खड़ा रहना पड़ा। दर्शक कवियों को सुनने आए थे लेकिन उन्हें नेताओं के भाषण झेलने पड़े।
छूट भैया नेता, छोटे-मोटे कार्यकर्ता, मोहल्ला अध्यक्ष, गली अध्यक्ष, घर का अध्यक्ष उनके साथ ही उनके पूर्व अध्यक्ष सब स्टेज पर एक भीड़ की तरह दिखाई दियें । घर अध्यक्ष से लेकर विधानसभा अध्यक्ष से लेकर पूर्व अध्यक्षों के अध्यक्ष तक स्टेज को घेरे रहे, एक दूसरे को फोटो खिंचवाने की ऐसी ललक रहती है कोई भी स्टेज छोड़ने का नाम ही नहीं लेता मजाल है कोई नीचे उतर जाए। सभी अपने आप को स्टेज पर दिखाना चाहते हैं, जनता जाए भाड़ में बोर हो चाहे कुछ भी हो।
हद तो तब होती है जब 8:30 से लेकर 10:30 तक दर्शकों को बोर करने के बाद भी बाहर से आए कवियों को स्टेज के नीचे एक तरफ साइड में खड़ा होकर विधायक चालीसा सुननी पड़ती है।

वीआईपी सीटें शराबियों के नाम
गणमान्य अतिथियों के लिए की गई बैठक व्यवस्था पर शराबियों का जमावड़ा हो गया। गणमान्य लोग पीछे कहीं कुर्सी ढूंढते नजर आए और शराब की बदबू झेलने को मजबूर हुए। नगर पालिका कर्मचारी, जिन्हें व्यवस्था संभालनी थी, वे खुद स्टेज के सामने बैठकर कार्यक्रम का आनंद लेते रहे।

मैदान और सफाई पर शून्य ध्यान
दशहरा मैदान और दुकानों के आगे कचरा, प्लास्टिक थैलियों का ढेर बिखरा रहा। गायें वही कचरा खाती देखी गईं। नगर पालिका, जिसका मूल काम अगली सुबह सफाई करना था, उसने भी कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई।

बड़ा सवाल: आखिर लाखों का खर्च कहां?
सूत्रों के अनुसार मेले का बजट 20 से 30 लाख रुपये तक है, लेकिन परिणाम हर बार निराशाजनक ही रहते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम और आयोजन जनता के लिए मनोरंजन का साधन होना चाहिए, लेकिन जब खर्च लाखों में हो और नतीजा हजारों में भी न मिले, तो सबसे बड़ा सवाल उठता है—आखिर यह लाखों रुपये खर्च होते कहां हैं?


