दो ‘दीमकों’ के बीच मांडलगढ़ नगर पालिका का चुनाव—पुरानी दीमक हटेगी या नई और बड़ी दीमक कब्जा करेगी?
मांडलगढ़ नगर पालिका का इस बार का चुनाव सिर्फ पार्षद चुनने का चुनाव नहीं है।
यह चुनाव शायद यह तय करने वाला है कि नगर पालिका का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में रहेगा।
क्योंकि मांडलगढ़ की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग जानते हैं कि करीब 15/16 साल पहले नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा एक चेहरा उस समय पहली बार किसी बड़े सार्वजनिक पद पर आया था।
लेकिन सत्ता का स्वाद ऐसा लगा कि नगर पालिका सिर्फ पद नहीं रही—सत्ता का केंद्र बन गई।
आरोप लगते रहे कि नगर पालिका की व्यवस्था का इस्तेमाल निजी हितों और अपनी संपत्तियों से जुड़े मामलों में किया गया।
कई सवाल उठे। कई मामलों की चर्चाएं हुईं।
यहीं से शुरू होती है मांडलगढ़ नगर पालिका की सबसे दिलचस्प राजनीतिक कहानी।
अध्यक्ष बदलते गए, रिमोट वही रहा?
नगर पालिका अध्यक्ष का चेहरा बदलना लोकतंत्र में सामान्य बात है।
लेकिन अगर अध्यक्ष बदलने के बाद भी फैसलों की दिशा वही रहे, सत्ता का प्रभाव वही रहे और पीछे से नियंत्रण भी वही दिखाई दे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या मांडलगढ़ में पिछले 15-20 वर्षों से अध्यक्ष बदलते रहे, लेकिन नगर पालिका का रिमोट कंट्रोल नहीं बदला?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से सुनाई देती रही है कि एक प्रभावशाली पूर्व अध्यक्ष ने अपने बाद आने वाले अध्यक्षों को अपने प्रभाव में रखा।
किसी को राजनीतिक समर्थन से।
किसी को आर्थिक ताकत से।
किसी को संगठन के माध्यम से।
और किसी को परिस्थितियों के हिसाब से।
लेकिन रिमोट?
वही!
अगर यह सिर्फ राजनीतिक अफवाह है तो संबंधित लोग इसे गलत साबित करने के लिए स्वतंत्र हैं।
लेकिन अगर जनता के बीच यह धारणा 15-20 साल बाद भी कायम है तो यह अपने आप में बड़ा राजनीतिक सवाल है।
तीसरे कोण के 16 निर्दलीय उम्मीदवार—सिर्फ संयोग?
अब आइए इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर।
जिस राजनीतिक परिवार/सत्ता-केंद्र का वर्षों से एक प्रमुख राजनीतिक दल के साथ मजबूत जुड़ाव माना जाता है, उसी प्रभावशाली खेमे से जुड़े माने जाने वाले 16 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में क्यों हैं?
अगर पार्टी ही अपनी है तो निर्दलीय क्यों?
अगर संगठन पर भरोसा है तो बाहर से उम्मीदवार क्यों?
और अगर उद्देश्य सिर्फ पार्षद बनना है तो इतने बड़े पैमाने पर निर्दलीय उम्मीदवार खड़े करने की जरूरत क्यों पड़ी?
या इनके पीछे नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी का कोई बड़ा गणित है?
क्या लक्ष्य यह है कि निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या इतनी हो जाए कि चुनाव के बाद अध्यक्ष बनाने-बिगाड़ने की चाबी इसी खेमे के हाथ में रहे?
और अगर ऐसा है तो अगला सवाल और बड़ा है—
अध्यक्ष कौन बनेगा?
परिवार का कोई सदस्य?
या फिर एक बार फिर कोई ऐसा चेहरा जिसके हाथ में कलम होगी, लेकिन रिमोट कहीं और?

पुरानी ‘दीमक’ की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
पुरानी व्यवस्था के बारे में जो राजनीतिक चर्चा है, उसमें एक दिलचस्प बात कही जाती है।
यह ‘दीमक’ नगर पालिका तक सीमित रही।
नगर पालिका के संसाधनों, प्रभाव और सत्ता का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करने की कोशिशों के आरोप भले लगे हों, लेकिन जनता के बीच यह धारणा भी रही कि इसका सीधा असर हर नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं पड़ा।
यानी नुकसान था तो सीमित दायरे में।
लेकिन अब मांडलगढ़ की कहानी में एक दूसरी ‘दीमक’ का प्रवेश बताया जा रहा है।
और यही इस चुनाव को पहले के चुनावों से अलग करता है।
तीन साल में पैदा हुई दूसरी ‘दीमक’
पिछले करीब तीन वर्षों में विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में एक नया सत्ता-केंद्र बेहद मजबूत हुआ है।
वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव सिर्फ विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने की चर्चा है।
नगर पालिका की राजनीति में भी उसकी दखलअंदाजी दिखाई देने की बात कही जा रही है।
यहीं से पुरानी और नई ‘दीमक’ का फर्क समझ में आता है।
नई दीमक का दायरा बड़ा बताया जा रहा है।
राजनीतिक चर्चाओं में आरोप है कि अब समर्थक-विरोधी का फर्क भी नहीं बचा।
जिसके रास्ते में फायदा है, रास्ता साफ।
जिसके रास्ते में सवाल है, उसके लिए परेशानी।
जिस काम में विकास के नाम पर बड़ा आर्थिक लाभ निकल सकता है, उसकी प्राथमिकता अलग।
और जहां राजनीतिक या आर्थिक फायदा कम दिखाई दे, वहां विकास की गति अलग।
विकास जनता के लिए या कमीशन के लिए?
मांडलगढ़ की जनता का पैसा आखिर किसके लिए है?
सड़क जनता के लिए।
नाली जनता के लिए।
पानी जनता के लिए।
लाइट जनता के लिए।
पार्क जनता के लिए।
नगर पालिका का हर विकास कार्य जनता के लिए।
फिर सवाल यह है कि विकास की प्राथमिकता तय करते समय सबसे पहले किसका हित देखा जाता है?
या ठेकेदार का?
या राजनीतिक कमीशन का?
चुनावी चर्चाओं में तरह-तरह के प्रतिशतों की बातें होती हैं।
लेकिन यहां प्रतिशत से भी बड़ा सवाल है—
क्या कोई काम इसलिए हो रहा है क्योंकि वह जरूरी है, या इसलिए क्योंकि उसमें फायदा ज्यादा है?
अगर यह आरोप गलत है तो सत्ता में बैठे लोगों को आंकड़ों के साथ जवाब देना चाहिए।
कौन सा काम कब हुआ?
कितने में हुआ?
किस ठेकेदार को मिला?
कितना भुगतान हुआ?
कितनी गुणवत्ता जांच हुई?
और जनता को उससे वास्तविक लाभ कितना मिला?
यही पारदर्शिता सबसे बड़ा जवाब होगी।
अब असली खेल अध्यक्ष की कुर्सी का है
यह चुनाव सिर्फ वार्ड जीतने का चुनाव नहीं है।
यह अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जे का चुनाव है।
16 निर्दलीय उम्मीदवारों का गणित सफल हुआ तो क्या होगा?
अगर इनमें से पर्याप्त संख्या जीतती है तो अध्यक्ष बनाने के लिए किसकी जरूरत पड़ेगी?
किससे समर्थन लिया जाएगा?
किसे अध्यक्ष बनाया जाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—
या फिर उसके पीछे भी वही पुराना रिमोट कंट्रोल होगा?
क्योंकि अगर पुरानी व्यवस्था का रिमोट इस बार भी सक्रिय रहा तो सवाल सिर्फ अध्यक्ष का नहीं रहेगा।
सवाल उन फाइलों का भी रहेगा जिन पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं।
उन संपत्तियों का भी रहेगा जिनसे जुड़े विवादों की चर्चाएं होती रही हैं।
और उन निर्णयों का भी रहेगा जिनका फायदा आखिर किसे मिला, यह जनता जानना चाहेगी।
पत्नियों को मैदान में उतारना भी सिर्फ राजनीति नहीं?
इस चुनाव में एक और पैटर्न दिखाई दे रहा है।
कई राजनीतिक चेहरे खुद मैदान में नहीं हैं।
उनकी जगह उनकी पत्नियां चुनाव लड़ रही हैं।
सवाल यह नहीं कि पत्नी चुनाव क्यों लड़ रही है। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।
सवाल यह है कि इसके पीछे राजनीतिक गणित क्या है?
क्या उद्देश्य सिर्फ पार्षद बनाना है?
या अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता तैयार करना?
क्या परिवार के भीतर राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना इसका हिस्सा है?
क्या खुद चुनाव लड़ने की बजाय परिवार के दूसरे सदस्य को आगे करने से राजनीतिक जोखिम कम होता है?
और क्या इससे पर्दे के पीछे प्रभाव बनाए रखना आसान होता है?
मांडलगढ़ को इस बार फैसला करना होगा
अब सवाल मांडलगढ़ की जनता के सामने है।
क्या वह 15-20 साल पुराने रिमोट कंट्रोल को फिर स्वीकार करेगी?
क्या 16 निर्दलीय उम्मीदवारों का राजनीतिक गणित सफल होगा?
क्या पुराना सत्ता-केंद्र अपने प्रभाव को फिर नगर पालिका तक पहुंचा पाएगा?
या फिर पिछले तीन वर्षों में मजबूत हुए नए सत्ता-केंद्र को नगर पालिका पर भी निर्णायक प्रभाव मिलेगा?
और अगर दोनों प्रभावशाली खेमे अपने-अपने तरीके से नगर पालिका पर नियंत्रण चाहते हैं तो तीसरा सवाल सबसे बड़ा है—
क्योंकि नगर पालिका किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं है।
न अध्यक्ष की।
न विधायक की।
न किसी पूर्व अध्यक्ष की।
न किसी परिवार की।
नगर पालिका जनता की है।
और जनता के पैसे से चलने वाली व्यवस्था का रिमोट भी अंततः जनता के हाथ में ही होना चाहिए।
अगले अध्याय में क्या?
यह तो सिर्फ शुरुआत है।
आगे देखेंगे—
कौन-कौन से 16 निर्दलीय उम्मीदवार किस राजनीतिक समीकरण को मजबूत कर सकते हैं?
किस वार्ड में कौन किसका वोट काट सकता है?
कहां परिवार बनाम परिवार है?
कहां पार्टी के भीतर ही असंतोष है?
कहां निर्दलीय उम्मीदवार वास्तव में स्वतंत्र है और कहां उसके पीछे किसी बड़े खेमे की ताकत दिखाई देती है?
कौन से नेता खुद चुनाव से बाहर रहकर भी सत्ता के सबसे करीब रहना चाहते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
या फिर इस बार मांडलगढ़ की जनता सचमुच रिमोट अपने हाथ में लेगी?
कहानी अभी बाकी है।
अगले अध्याय में और परतें खुलेंगी।
“`
