मुकेश खटीक
मंगरोप।करीब साढ़े चार सदियों से कस्बे की पहचान रहे धार्मिक स्थल अब बदहाली के शिकार हो रहे है देखरेख के अभाव में जर्जर होने की कगार पर है मंगरोप ग्राम पंचायत आज उस मोड़ पर खड़ी है जहां उसे सिर्फ नेतृत्व नहीं,बल्कि प्रबल,सशक्त और दूरगामी सोच वाले प्रतिनिधित्व की सख्त जरूरत है।पिछले पच्चीस वर्ष से गांव शिक्षा,चिकित्सा,सड़क,जल,स्वच्छता और धार्मिक स्थलों सहित अनेक मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझता आ रहा है।ग्रामीणों का मानना है कि वर्षों से चली आ रही समस्याओं पर प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल न होने से गांव का विकास ठहर गया है।
हिन्दू श्मशान घाट की बदहाल स्थिति
गांव में अंतिम संस्कार स्थल की स्थिति अत्यंत दयनीय है।उचित चबूतरा,पेयजल,छाया,खस्ताहाल रास्ता जिसपर बरसात में शवयात्रा ले जाना भी मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों ने इसे गांव की सबसे गंभीर और संवेदनशील समस्या बताते हुए तुरंत सुधार की मांग की है।
20 वर्षों से सीएचसी की मांग अधूरी
मंगरोप में आज भी ग्रामीण एक बेसिक चिकित्सा व्यवस्था के लिए तरस रहे हैं।स्थानीय लोग पिछले दो दशकों से सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र (CHC) की मांग कर रहे हैं,लेकिन फाइलें आज भी धूल खा रही हैं।गांव की बढ़ती जनसंख्या,दुर्घटनाओं और बीमारी के मामलों में प्राथमिक उपचार भी समय पर नहीं होता है,जिसके चलते मरीजों को 25 किलोमीटर दूर जिला चिकित्सालय जाना पड़ता है।कई गंभीर मामलों में देरी जानलेवा साबित हो चुकी है।
प्राचीन मंदिर और धार्मिक धरोहरें उपेक्षा की मार झेल रही हैं
मंगरोप की पहचान उसकी 450 वर्ष पुरानी सनातन विरासत है,जिसमें कई प्राचीन मंदिर,देवस्थान शामिल हैं।मगर इनका संरक्षण नहीं होने से ढांचों में दरारें,टूट-फूट और अव्यवस्थाएं बढ़ गई हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह न केवल सांस्कृतिक घाटा है,बल्कि पर्यावरण और गांव की पहचान के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।
शिक्षा व्यवस्था में निरंतर गिरावट
गांव में गुणवत्तापूर्ण विद्यालयों और संसाधनों का अभाव छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है।प्रयोगशाला,पुस्तकालय,खेल मैदान,स्मार्ट कक्षाएं-अधिकांश सुविधाएं कागजों में ही सीमित हैं।पूर्व में इस गांव की मिट्टी ने कई ऐसे सुरमा जने है जिन्होंने शिक्षा,चिकित्सा एवं कई बड़े प्लेटफॉर्म पर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाकर मंगरोप कस्बे को उच्च शिखर तक पहुंचाया है।मंगरोप की सीनियर स्कूल से जानकारी है तबतक 387 शिक्षक बनकर निकले है जिनमें 27 शिक्षक खटीक समाज से है जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है कि किसी कस्बे से या किसी समाज के इतने शिक्षक एक ही स्कूल से बनकर निकले हो।इसे शिक्षकों का गांव भी माना जाता है।लेकिन पिछले 20 सालों से इस गति पर कुछ हद तक विराम लग चुका है अब इस स्कूल कुछ ही सफल होकर निकल रहे है बाकी अब तो अधिकतर फैक्ट्री वर्कर या मजदूर ही निकल रहे है।
ग्रामीणों की आवाज:अब समय है निर्णायक कदमों का
गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक सभी की एक ही मांग है कि—“अब मंगरोप को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो गांव की समस्याओं को भविष्य की प्राथमिकता मानकर काम करे,न कि चुनावी वादों तक सीमित रहे।”ग्रामीणों ने जिला प्रशासन,पंचायत समिति और जनप्रतिनिधियों से आग्रह किया है कि वे श्मशान घाट के विकास,CHC की स्वीकृति,धार्मिक स्थलों के संरक्षण और शिक्षा–स्वास्थ्य सुधार को तात्कालिक प्राथमिकता दें।













