मुकेश खटीक
मंगरोप।कस्बे में होली के दूसरे दिन धुलंडी के अवसर पर खटीक समाज द्वारा परंपरागत ढूंढोंत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया।इस अवसर पर समाज की वर्षों पुरानी परंपरा को निभाते हुए नवजात शिशुओं के नाम “ढूंढने” की रस्म अदा की गई।ढूंढोंत्सव के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लोकेश खटीक ने बताया कि यह परंपरा मूलतः भीलवाड़ा जिले में खटीक समाज में प्रचलित है।इसके तहत एक वर्ष के भीतर जन्मे बच्चों का नाम ढूंढने की रस्म निभाई जाती है।जन्म के समय भले ही बच्चे का नामकरण हो जाए,लेकिन ढूंढोंत्सव की परंपरा पूरी होने के बाद ही उस नाम को सामाजिक मान्यता मिलती है।इस अवसर पर कई परिवारों द्वारा सामूहिक भोज का आयोजन भी किया गया,जिसमें रिश्तेदारों,गांववासियों और विशेष रूप से समाज के लोगों को आमंत्रित कर भोजन कराया गया। ढूंढोंत्सव का आयोजन प्रायः शाम के समय किया जाता है।रंग खेलने के बाद करीब शाम 6 बजे खटीक समाज के युवक लगभग 10 फीट लंबा बांस का डंडा लेकर बच्चे के घर पहुंचते हैं।रस्म के दौरान बच्चे की बुआ उसे गोद में लेकर घर की दहलीज पर खड़ी होती है।इसके बाद युवक बांस की लकड़ी को दरवाजे के ऊपर रखकर स्थानीय भाषा में पारंपरिक बोल बोलते हुए बच्चे को “ढूंढते” हैं।इस अनूठी परंपरा के समापन पर बच्चे के पिता द्वारा युवकों को यथोचित राशि भेंट स्वरूप दी जाती है।कस्बे के में करीब 6 जगह ढूंढोंत्सव का आयोजन किया गया जिससे गांव में उत्सव जैसा माहौल रहा और समाज की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का संदेश भी दिया गया।
