मोदी बनाम नेहरू — बड़ा कौन?

(आलेख : संजय पराते)

स्मार्ट हलचल।नरेंद्र मोदी अपने आपको नेहरू से बड़ा दिखाने की हवस में यह प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनका प्रधानमंत्री का कार्यकाल नेहरू से ज्यादा हो गया है और ज्यादा चमकदार है। इतिहास का मिथ्याकरण इसे ही कहते हैं। वास्तविकता यह है कि 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिलने के बाद 27 मई 1964 को अपनी मृत्यु तक जवाहरलाल नेहरू इस देश के लगातार प्रधानमंत्री रहे और उनका कुल कार्यकाल 6130 दिन (16 साल 9 महीने 12 दिन) का है। ये भारत में किसी भी प्रधानमंत्री का सबसे लंबा कार्यकाल है। नेहरू के इस रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए वर्तमान संघी प्रधानमंत्री मोदी को अभी कई पापड़ बेलने होंगे, क्योंकि प्रधानमंत्री बने हुए अभी उन्हें केवल 4400 दिन ही हुए हैं। नेहरू के इस रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए हमारी पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर 1733 चक्कर लगाने होंगे, यानी मोदी को 14,97,31,200 सेकंड (14 करोड़ 97 लाख 31 हजार 200 सेकंड) और अपनी कुर्सी के पायों को मजबूती से थामे रखना होगा, क्योंकि उनके नॉन-बायोलॉजिकल शरीर में इतनी क़ूबत नहीं है कि पृथ्वी की अपने अक्ष पर घूर्णन गति और सूर्य के चारों ओर की परिक्रमा गति को बढ़ाकर रात-दिन के कुल 24 घंटों और साल के 365 दिनों के समय को भी कुछ कम कर सके। गंगा मैया की अभी उन पर इतनी कृपा नहीं हुई है।

असल बात क्या है? सिर्फ इतना कि एक निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल नेहरू के बराबर हो गया है। यदि वे जीवित रहते, तो इसी बात की सबसे ज्यादा संभावना थी कि वे और ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री बने रहते और शायद मोदी भी उनके संभावित रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाते! खैर, मृत्यु पर किसी का बस नहीं होता और नरेंद्र मोदी अपने 12 साल के प्रधानमंत्रित्व के जश्न के जरिए वास्तव में नेहरू को इतनी जल्दी काल-कवलित हो जाने का धन्यवाद अदा कर रहे हैं।

मोदी और संघी गिरोह बहुत हड़बड़ी में है। वे नेहरू के पहले पांच वर्ष के कार्यकाल को इतिहास से मिटा देना चाहते हैं, जब उन्होंने इस देश के अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता संभाली थी। आजादी के समय देश में संविधान लागू नहीं हुआ था और हमारा देश भारत सरकार अधिनियम, 1935 तथा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 से शासित था। संविधान सभा ने, जो एक निर्वाचित संस्था थी और जिसकी हैसियत संसद के बराबर ही थी, नेहरू को प्रधानमंत्री चुना था और लार्ड माउंटबेटन ने नेहरू को भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेस के हाथ में देश की सत्ता सौंपी थी, क्योंकि आजादी की लड़ाई के दौरान वही इस देश में सबसे बड़ा संगठन बनकर उभरा था।

26 जनवरी 1950 को हमारे देश में संविधान लागू हुआ, जिसने हमारे देश को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया। इस संविधान को “हम भारत के लोगों” ने अपने आपको आत्मार्पित किया है। संविधान लागू होने के दो वर्ष बाद भारत में पहले आम चुनाव हुए, जिसके बाद जवाहरलाल नेहरू निर्वाचित प्रधानमंत्री बने।

दुनिया के किसी भी देश का इतिहास बताता है कि आजादी मिलने के दूसरे दिन ही निर्वाचित सरकार का गठन नहीं हो जाता। आजादी के बाद से पहले निर्वाचन तक का समय कितना कांटों भरा था, देश को मिली नई-नई आजादी को संजोने का जतन कितना मुश्किल था, यह तो वही लोग बता सकते हैं, जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी। जो लोग इस संघर्ष से बाहर थे और वास्तव में अंग्रेजों के हाथ मजबूत कर रहे थे, देश को धर्म के आधार पर विभाजित करने का मंत्र दे रहे थे, वे लोग आज भी खा तो रहे हैं बाबा साहेब के संविधान की कसम, लेकिन कर रहे हैं हिंदू-मुस्लिम ही!, ताकि वोटो की भरपूर फसल काटी जा सके, जो उन्हें सत्ता में बैठाए रखेगी और वे सत्ता की ताकत का इस्तेमाल बुलडोजर चलाने और हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए रास्ता बनाने के लिए कर सके। तो देश की आजादी के बाद 1952 में पहले आम चुनाव हुए और नेहरू पांच सालों तक अंतरिम प्रधानमंत्री बने रहे, तो इसमें उनकी क्या गलती?

लेकिन एक निर्वाचित प्रधानमंत्री से क्या वे कमतर थे? अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में रहते हुए क्या वे एक निर्वाचित प्रधानमंत्री की शक्तियों से महरूम थे? नहीं। मंत्रिमंडल का गठन, नीतियों का निर्माण, विदेश नीति का निर्धारण और वे सब शक्तियां उनके पास थी, जो एक निर्वाचित प्रधानमंत्री के पास होती है। इसलिए संघी गिरोह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नेहरू के अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में, पहले पांच सालों के कार्यकाल को न गिनना राजनैतिक अनैतिकता और इतिहास के साथ धोखाधड़ी है।

उल्लेखनीय है कि संघी गिरोह बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व में बनाए गए इस संविधान के पक्ष में ही नहीं था। इसका मतलब ही यह है कि वह इस संविधान के बुनियादी मूल्यों — लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, समानता, धर्मनिरपेक्षता और वयस्क मताधिकार — के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्निर्माण नहीं करना चाहता था। उसके लिए तो वह मनुस्मृति ही पवित्र ग्रन्थ था, जिसे वह संविधान का दर्जा देना चाहता था और वर्ण व्यवस्था के आधार पर सामंती मूल्यों के साथ समाज का पुनर्गठन करना चाहता था। आज भी उसके लिए मनुस्मृति ही पथ-प्रदर्शक ग्रंथ है और केंद्र की सत्ता में आने के 12 सालों का इतिहास बताता है कि रोजमर्रा के जीवन में उसने मनुस्मृति को हमारे समाज पर लादा है और संविधान और उसके बुनियादी मूल्यों को उसने कमजोर किया है। उसका हर एक सधा कदम हमारे देश को मनुवाद के ढांचे में जकड़ने के लिए उठ रहा है।

लेकिन क्या इस बात का जश्न मनाया जा सकता है कि कौन से प्रधानमंत्री ने अतीत के किस प्रधानमंत्री से ज्यादा समय तक राज किया है? यह बेशर्मी की हद है! लेकिन संघी गिरोह और मोदी सरकार में कोई राजनैतिक शर्म ही कहां बची है?

फिर भी सवाल अपनी जगह है। कौन बड़ा — नेहरू या मोदी? इस सवाल का जवाब तो नेहरू और मोदी के कामों की तुलना से ही मिल सकता है। यह नेहरू ही थे, जिन्होंने आजादी के बाद देश को विभाजन की पीड़ा से बाहर निकाला। इस पीड़ा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की संघी गिरोह द्वारा हत्या भी शामिल है। यह नेहरू ही थे, जिन्होंने देश के विकास के लिए वैज्ञानिक शिक्षा के प्रचार पर बल दिया और देश के आधुनिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं और सार्वजनिक क्षेत्र की बुनियाद रखी। यह नेहरू ही थे, जिनके नेतृत्व में भारत पिछड़े और गरीब देशों की आवाज बना और जिसकी आवाज गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जरिए पूरी दुनिया सुनती थी, क्योंकि उन्होंने साम्राज्यवाद के किसी भी दबाव में आने से इंकार किया था।यह नेहरू ही थे, जिनके समय भारत ने मानव विकास संकेतकों की सीढ़ी पर चढ़ना शुरू किया था और जिन्होंने एक गुलाम अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था में ढालने का काम किया था। और हां, इन सब उपलब्धियों को याद करते हुए यह याद रखना भी जरूरी है कि वे किसी प्रकार का “गोदी मीडिया” भी नहीं पाल रहे थे।

और मोदी की उपलब्धियां? जिस संविधान की कसम खाकर वे सत्ता में आए हैं, उसे निष्प्रभावी बनाने के काम में मनोयोग से लगे हैं। एक संप्रभु देश को अमेरिका के अधीनस्थ रणनीतिक सहयोगी में बदल रहे हैं। सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत को नफरत भरी हिंदू-मुस्लिम कट्टरता में ढाल रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को बेच-बेचकर देश चलाने के लिए राजकोषीय घाटे को पाटने की कला में पारंगत हो रहे हैं। उनके राज में जितनी जीडीपी बढ़ रही है, उससे ज्यादा आय और संपत्ति की असमानता बढ़ रही है। मानव विकास सूचकांक की सीढ़ी से हर मामले में देश का ढ़ुलकना जारी है। यह मोदी ही है, जो अडानी-अंबानी की गुलामी के लिए दुनिया के राजनयिकों के बीच कही ढोल पीट रहे हैं, कहीं नाच रहे है और ‘मेलोडी है चॉकलेटी’ का तमाशा करके भारत की गरिमा को गरिमा को गिरा रहे हैं। मोदी राज में हमारा भारत एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य का चरित्र खो रहा है और बड़ी तेजी से कट्टर हिंदूवादी-फासीवादी तानाशाह राज्य में बदल रहा है, जहां अल्पसंख्यक और गरीब नागरिकों के लिए दोयम दर्जे की अधिकारविहीन नागरिकता ही बची है। लेकिन हां, नरेंद्र मोदी और संघी गिरोह के पास कॉर्पोरेट और हिंदुत्व के गठजोड़ से पैदा एक गोदी मीडिया जरूर है, जो उन पर लगे दाग को भी चंद्रमा की खूबसूरती की तरह बताने में दिन-रात एक किए हुए हैं।

हां, इतिहास का एक और तथ्य नहीं भूलना चाहिए। वह यह कि नेहरू जीवन पर्यंत कांग्रेस के पूर्ण बहुमत वाली सरकार के प्रधानमंत्री थे और उनका प्रधानमंत्रित्व किसी दल-विशेष की कृपा पर टिका हुआ नहीं था। नरेंद्र मोदी पिछले 12 सालों से गठबंधन सरकार के ही मुखिया है और अपने तीसरे कार्यकाल में तो उनकी पार्टी भाजपा बहुमत से इतनी दूर है कि उनकी कुर्सी टिकाए रखने के लिए दो बैसाखियों की जरूरत है।

सारतः, नेहरू का युग भारत को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का युग था, तो मोदी राज के पिछले 12 बरस हमारे देश को प्रकाश से अंधकार की ओर ले जाने का युग है, सभ्यता से असभ्यता और बर्बरता की ओर ले जाने का युग है।

लेकिन किसी देश और सभ्यता के इतिहास में ऐसे अंधेरे भरे क्षण भी आते हैं, जिनसे आज हमारा देश गुजर रहा है। लेकिन अंधकार के क्षण स्थायी नहीं होते। स्थायी तो वह प्रकाश ही है, जिसके कारण मानव जाति आदिम सभ्यता से निकलकर आधुनिक सभ्यता तक पहुंच चुकी है और अतीत में भी अंधकार की कोई दीवार विकासमान सभ्यता के प्रकाश को रोक नहीं पाई है। नेहरू काल की दीप्ति को मोदीकाल का अंधेरा हरने की स्थिति में नहीं है। नरेंद्र मोदी और संघ की बौखलाहट, नेहरू के प्रति उनकी नफरत इसी कारण से है। जितनी वे नेहरू की लकीर को मिटाने की कोशिश करेंगे, उतनी ही उनकी ही लकीर और ज्यादा छोटी होती जाएगी।

इस आलेख का समापन एक बाल कथा से। मेंढकों के झुंड के एक सरदार पर हर प्राणी से बड़ा बनने-दीखने का भूत सवार हुआ। हर समय वह यही पूछता था — सबसे बड़ा कौन रे भैया, सबसे बड़ा कौन? मेंढकों का समूह कोरस में जवाब देता था — आप हुजूर, आप! एक दिन एक मेंढक को एक बैल दिखा और उसने हिम्मत करके सरदार को उस प्राणी की ओर इशारा कर दिया। मेंढ़को के सरदार ने अब उस बैल से मुकाबला करने के लिए गुब्बारे की तरह अपने शरीर को फूलाना शुरू किया और अंततः उसका पूरा शरीर फट गया। यही हाल मोदी का है, जो पूछ रहे हैं — सबसे बड़ा कौन रे भैया, सबसे बड़ा कौन? और गोदी मीडिया कोरस में जवाब दे रहा है — आप हुजूर, आप!
गोदी मीडिया द्वारा फुलाए जा रहे इस गुब्बारे का हश्र सभी को मालूम है, सिवा मोदी और संघी गिरोह को छोड़कर। हर फासीवादी तानाशाह का यही हश्र होना है।

*(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*