अनिल कुमार
ब्यावर।स्मार्ट हलचल|धर्मपरायण नगरी ब्यावर में आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य, श्रुतसंवेगी महाश्रमण मुनि श्री 108 आदित्य सागर जी महाराज ससंघ का सोमवार को धर्म नगरी में जयघोषों के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। श्री दिगंबर जैन पंचायत के प्रवक्ता अमित गोधा ने बताया कि सकल दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण जयकारों के साथ मुनि श्री ससंघ की अगवानी की।
समाजजनों ने बैंड-बाजों, ढोल बाजो के साथ, विभिन्न महिला एवं पुरुष मंडलों की उपस्थिति में भव्य मंगल प्रवेश उत्सव आयोजित किया। मंगल प्रवेश यात्रा पार्श्वनाथ मंदिर दर्शन उपरांत भगत चौराहा से प्रारंभ होकर सरावगी मोहल्ला, एकता सर्किल, अजमेरी गेट होते हुए श्री दिगंबर जैन पंचायती नसियां पहुँची, जहाँ यह धर्मसभा में परिवर्तित हुई।
भगत चौराहे पर मुनि श्री ससंघ के चरणों में 51 थालों में पाद प्रक्षालन का सौभाग्य सैकड़ों श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
पंचायती नसियां जी में आयोजित धर्मसभा में दीप प्रज्वलन श्री दिगंबर जैन पंचायत, श्री दिगंबर जैन मारवाड़ी समाज एवं श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, अजमेर रोड समिति के सदस्यों द्वारा किया गया।
पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य ताराचंद, संजय कुमार, जितेंद्र, कमलेश ठोलिया एवं निमाजवाला परिवार को प्राप्त हुआ।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मुनि संघ से मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन कमल रावका ने किया।
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ज्ञान की महिमा पर मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज का प्रवचन
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री 108 आदित्य सागर जी महाराज ने कहा कि ज्ञान ही आत्मा का वास्तविक प्रकाश है। बिना ज्ञान के किया गया धर्म आडंबर बन जाता है, जबकि ज्ञानयुक्त धर्म मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
मुनि श्री ने कहा कि धन, वैभव और पद क्षणिक हैं, परंतु ज्ञान शाश्वत है। जीवन में आने वाले अंधकार को केवल ज्ञान रूपी दीपक ही दूर कर सकता है। सम्यक् ज्ञान से ही व्यक्ति सही-गलत का विवेक कर पाता है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान से विनय, विनय से पात्रता और पात्रता से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः प्रत्येक श्रावक-श्राविका को चाहिए कि वह केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहे, बल्कि शास्त्रों का अध्ययन कर ज्ञानार्जन करे।
मुनि श्री ने युवाओं से आह्वान किया कि वे भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान को भी जीवन में उतारें। ज्ञानयुक्त जीवन ही सच्चा सुख देता है तथा अहंकार का क्षय कर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करता है।
प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने कहा कि ज्ञान ही वह साधन है, जो जीव को संसार से मुक्त कर सिद्धत्व की ओर ले जाता है। अतः जीवन में ज्ञान, संयम और विवेक को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।













