Homeराजस्थानचित्तौड़गढ़‘मेरा अवगुण भरा शरीर, कहो ना कैसे तारोगे..’

‘मेरा अवगुण भरा शरीर, कहो ना कैसे तारोगे..’

मन में जब भी कोई व्यथा हो तो कथा अवश्य सुनें- पूज्य पं.कमल किशोर नागर जी
श्रीमद भावगत कथा के दूसरे दिन उमड़ा हाड़ौती एवं मालवा के भक्तों का सैलाब
बकानी, 16 जनवरी। स्मार्ट हलचल|दिव्य गौसेवक संत पं.कमल किशोरजी नागर ने बकानी के पास थोबडिया खुर्द गांव में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे सोपान में शुक्रवार को कहा कि जब हमारा चित्त, बुद्धि शांत नहीं हों, मन में हमेशा व्यथा बनी रहती हो तब कथा अवश्य सुनना चाहिये। उन्होंने कहा कि सौ मण ज्ञान से एक तौला आचरण बनता है। जब अच्छा आचरण आत्मा में प्रवेश करेगा तब हमारा व्यवहार भी विनम्र हो जायेगा।
पूज्य पं.नागर जी ने एक प्रसंग सुनाते हुये कहा कि मन को स्थिर करने के लिये गहरा चिंतन करें। कथा-सत्संग में आकर पहले 40 मिनट मन को शांत व स्थिर करना है। क्योंकि मन शेर व शैतान की तरह इधर-उधर दौड़ता है। कथा में भजन और भक्ति करने से यह शेर रूपी मन पिंजरे में बंद हो जाता है। इसे वश में करना आसान नहीं। स्थिर मन को उल्टा करो तो नम-नम अर्थात झुकना शुरू करता है। तभी इसमें तत्व ज्ञान का वास हो पायेगा।
मालवा एवं हाडौती अंचल से पहुंचे हजारांे भक्तों से भरे पांडाल में उन्होंने सुमधुर भजन-‘मेरा अवगुण भरा शरीर, कहो ना कैसे तारोगे..’ सुनाकर सबके मन के तार अटूट भक्ति से जोड दिये। उन्होंने कहा कि गुरू एवं भक्त दोनो तत्व ज्ञानी हों। गुरू संत स्वभाव के हों, जिनके मुंह से राम नहीं निकले वह राक्षस समान है। गुरू के पास वाणी है तो भक्त पानी की तरह है। वाणी में वजन है तो मात्र 40 मिनट में मन स्थिर हो जाता है।
भक्ति व भगवान से संबंध जोडें-
पूज्य नागरजी ने कहा कि चित्रकूट में तपस्वी शरीर और स्थिर मन वाले संत हैं। आपका मन कितना भी अस्थिर हो, उसे भक्ति के आगे झुका देते हैं। भागवत कथा में भी नित्य 40 मिनट मन को स्थिर करने का अभ्यास करें। इससे भगवान से जुड़ाव महसूस होने लगेगा। गुरू अपनी वाणी को स्थिर रखें तो पानी में दाल घुल जाती है। लेकिन एक पानी ऐसा भी होता है, जिसमें दाल नहीं घुलती है। जो व्यास पीठ से किसी की निंदा नहीं करते हैं उसके पानी में दाल घुल जाती है। इसलिये सदैव निंदक नियरे राखिये।
उन्होंने कहा कि एक कोरे वस्त्र पर कंकू की एक बूंद लगाने मात्र से वह पवित्र हो जाता है। इसी तरह, जीवन में गमी और कमी के समय यदि भक्ति का छींटा लग जाये तो उसका भगवान से संबंध बन जाता है। आपको जीवन में अपार धन, दौलत व पुत्र प्राप्त हो तब भागवत संबंध प्राप्त करने का प्रयास करें। धन तो कोई चोर भी प्राप्त कर लेता है।
उन्होने कहा कि जीवन में सोना असली है या नकली, घी असली है या नकली, यह सांप है या रस्सी, यह नहीं पहचान सके तो असली बह्म ज्ञान कहां और कैसे मिलेगा, यह पता नहीं चलेगा। सूरदास भले ही अंधे थे लेकिन उनकी लकड़ी में ज्ञान का वास था। आप कथा के माध्यम से अपने भीतर भक्ति का वास करें।
‘मेरी प्रीत न छूटे नंदलाल से..’ – बाल संत गोविंद
श्रीमद भागवत कथा के प्रारंभ में 11 वर्षीय बाल संत गोविंद ने कहा कि मनुष्य यदि अपना लक्ष्य बनाकर आगे बढे़ तो अंत में वह सफल जरूर होता है। भले ही उसे कितना भी समय लग जाये। इसी तरह, परमात्मा भी उनकी बात अवश्य सुनते हैं, जिनसे उनका संबंध होता है। इसलिये भगवान से संबंध बनाने का प्रयास जरूर करें। जीवन में झूठ व मिथ्या का साथ छोडकर गोविंद का साथ करो। उन्होंने मधुर वाणी में भजन- ‘मेरी प्रीत न छूटे नंदलाल से..’ सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। बाल संत ने कहा कि जब हंगामा करने से किसी को खूब पैसे मिल सकते हैं तो भजन करने से भगवान कैसे नहीं मिल सकते हैं। अंत में आयोजक परिवार ने श्रीमद भागवत की महाआरती की।

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