कलेक्टर की सख्ती से खुली मिलीभगत की परतें, पटवारी ने दबाई थी सुंदरम रेजिडेंसी नामक अवैध कॉलोनी की रिपोर्ट

कलेक्टर के आदेश‌ पर सुन्दरम रेजिडेंसी नामक अवैध कालोनी में चली जेसीबी, सिटी पटवारी पर 17 सीसीए की कार्यवाही।

बूंदी- स्मार्ट हलचल।शहर में कृषि भूमि पर भू-उपयोग परिवर्तन करवाऐ बिना अवैध रूप से कालोनियां काट कर भूखण्ड बेचने का गोरखधंधा काफी समय से चल रहा है क्योंकि जिले में कृषि भूमि की सुरक्षा और अवैध कॉलोनियों पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों और कर्मचारियों के कंधों पर है, उन्हीं पर अब नियमों को दरकिनार कर भूमाफियाओं को संरक्षण देने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। देवपुरा क्षेत्र में कृषि भूमि पर बिना भू-उपयोग परिवर्तन और बिना किसी वैधानिक अनुमति के विकसित की जा रही सुंदरम रेजिडेंसी नामक अवैध कॉलोनी के एक मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि सिटी पटवारी ने अवैध कॉलोनी की रिपोर्ट तैयार करने के बावजूद , रिपोर्ट को नियमानुसार तहसील कार्यालय में प्रस्तुत नहीं किया, जिससे भूमाफियाओं को खुलेआम भूखंड बेचने का अवसर मिलता रहा।
मामला समय उजागर हरफूल सिंह यादव तक पहुंची। जिला कलक्टर ने तत्काल तहसीलदार और नगर परिषद आयुक्त को कार्रवाई के निर्देश दिए।

जब तहसीलदार ने रिकॉर्ड की जांच करवाई तो पता चला कि जिस नोटिस की प्रति जिला कलक्टर कार्यालय से भेजी गई थी, वह संबंधित पटवारी ने कभी तहसील कार्यालय में जमा ही नहीं करवाई । इससे प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत और लापरवाही की परतें खुलने लगीं।

एक माह तक धड़ल्ले से बिकते रहे प्लॉट जानकारी के अनुसार शहर के कोटा रोड स्थित देवपुरा में आनंदी मैरिज गार्डन के पीछे खसरा नंबर 398 की करीब 2.0455 हेक्टेयर कृषि भूमि पर पिछले एक माह से अवैध रूप से कॉलोनी विकसित की जा रही थी। आरोप है कि भूमाफियाओं ने खातेदारों की भूमि की रजिस्ट्री करवाए बिना ही कॉलोनी का नक्शा तैयार कर भूखंडों का विक्रय शुरू कर दिया। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि उक्त भूमि का नगर परिषद में नियमन भी नहीं हुआ था और न ही भू उपयोग परिवर्तन की कोई वैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई थी।

पटवारी ने बनाई रिपोर्ट, फिर दबा दी फाइल

तहसीलदार अर्जुनलाल मीणा ने बताया कि जानकारी करने पर सामने आया कि सिटी पटवारी महादेव मेघवाल ने मौके का निरीक्षण कर खातेदार अशोक कुमार, यतीश कुमार सहित अन्य के विरुद्ध राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-ए के तहत कार्रवाई की रिपोर्ट 8 जून को तैयार कर ली थी। लेकिन इसके बाद रिपोर्ट न तो उन्हे भेजी गई और न ही तहसील कार्यालय में जमा करवाई गई। जिसके कारण भूमाफिया लगातार प्लॉट बेचते रहे और प्रशासनिक कार्रवाई ठंडे बस्ते में पड़ी रही।

कलक्टर के आदेश से खुला पूरा खेल

मामले में 18 जून को जब शिकायत जिला कलक्टर हरफूल सिंह यादव तक पहुंची तो उन्होंने तत्काल तहसीलदार अर्जुनलाल मीणा और नगर परिषद आयुक्त बृजेश रॉय को नोटिस और कॉलोनी का नक्शा भेजते हुए कार्रवाई के निर्देश दिए।

तहसीलदार ने जब रिकॉर्ड की जांच करवाई तो पता चला कि संबंधित नोटिस तहसील कार्यालय में मौजूद ही नहीं था। इसके बाद पटवारी से जवाब मांगा गया, तब उसने 15 जून को नोटिस तहसील कार्यालय में प्रस्तुत किया। इस पूरे घटनाक्रम ने पटवारी और भूमाफियाओं के बीच संभावित मिलीभगत की आशंकाओं को और गहरा कर दिया।

नगर परिषद की भूमिका भी सवालों के घेरे में

इस मामले में नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिस भूमि पर अवैध कॉलोनी विकसित की जा रही थी, उससे कुछ ही दूरी पर हाल ही में नगर परिषद ने अवैध स्विमिंग पूल को सीज करने की कार्रवाई की थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी अवैध प्लॉटिंग नगर परिषद के अधिकारियों की नजर से कैसे बच गई?

कलक्टर के निर्देश पर चली जेसीबी

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला कलक्टर हरफूल सिंह यादव ने तत्काल प्रभाव से अवैध कॉलोनी पर कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद तहसील प्रशासन और नगर परिषद की संयुक्त टीम ने देवपुरा पहुंचकर जेसीबी की सहायता से अवैध रूप से बनाई गई सड़कों को ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के दौरान तहसीलदार अर्जुनलाल मीणा, नगर परिषद आयुक्त बृजेश रॉय, अतिक्रमण प्रभारी रवि दाधीच, कनिष्ठ अभियंता जोधराज मीणा सहित अन्य अधिकारी और प्रशासनिक अमला मौजूद रहा।

पटवारी को जारी हुआ 17 सीसीए का नोटिस

उधर राजकार्य में गंभीर लापरवाही और संवेदनशील मामले को दबाने के आरोप में सिटी पटवारी महादेव मेघवाल को राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमों के तहत 17 सीसीए का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। जिला कलक्टर हरफूल सिंह यादव ने स्पष्ट किया कि अवैध कॉलोनियों के मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने तहसीलदार और नगर परिषद आयुक्त को भविष्य में नियमित निरीक्षण करने तथा कृषि भूमि पर अवैध प्लॉटिंग के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।

सरकारी खजाने को लाखों के राजस्व का नुकसान

भूमि विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि भूमि पर बिना अनुमति कॉलोनियां विकसित होने से सरकार को भारी राजस्व हानि होती है। भूमि रूपांतरण शुल्क, विकास शुल्क, नक्शा स्वीकृति शुल्क और और अन्य अन्य वैधानिक शुल्क सरकार के खाते में नहीं पहुंच पाते। इसके अलावा अनियोजित कॉलोनियों के कारण भविष्य में सड़क, जलापूर्ति, सीवरेज, बिजली और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। कृषि भूमि में लगातार कमी आने से खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित होता है