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“आदेश सख्त, अमल ढीला”: उनियारा कोर्ट के बाहर घोषित बस स्टॉप पर नहीं रूक रहीं रोडवेज बसें

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– न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी से पक्षकारों-गवाहों पर दोहरी मार-जवाबदेही तय करने की मांग तेज,

– आदेश कागजों तक सीमित रहेंगे या सड़क पर भी दिखाई देंगे?

शिवराज बारवाल मीना
टोंक/उनियारा। स्मार्ट हलचल|टोंक–सवाईमाधोपुर हाईवे पर स्थित उनियारा न्यायालय परिसर के बाहर बस स्टॉप को लेकर स्पष्ट प्रशासनिक आदेश होने के बावजूद कई रोडवेज बसों के नहीं रूकने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे बाहरी शहरों से आने वाले पक्षकारों, परिवादियों और गवाहों को अतिरिक्त दूरी तय कर कोर्ट पहुँचना पड़ रहा है। समय, धन और मानसिक दबाव—तीनों का अतिरिक्त बोझ अब न्याय पाने की प्रक्रिया को और कठिन बना रहा है।
*न्यायालय का स्पष्ट निर्देश—फिर ढिलाई क्यों?*
कार्यालय जिला एवं सैशन न्यायाधीश, टोंक द्वारा जारी पत्र में न्यायालय परिसर के बाहर बस रूकवाने की आवश्यकता दर्ज की गई। इसके अनुपालन में राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (टोंक आगार) ने 4 जुलाई 2024 के कार्यालय आदेश में टोंक–सवाईमाधोपुर–टोंक मार्ग की बसों के लिए नव निर्मित कोर्ट कॉम्प्लेक्स भवन के बाहर पास में प्राथमिक स्टॉप घोषित किया।
*आदेश में स्पष्ट उल्लेख*
अवहेलना पर अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर सवाल यह उठता है कि जब आदेश “तुरंत प्रभाव से लागू” है, तो निगरानी और पालन में कमी कहाँ है?
*जमीनी सच्चाई-पेशी से पहले संघर्ष*
राजस्थान रोडवेज की कई बसें कोर्ट परिसर के बाहर निर्धारित स्टॉप पर नहीं रूकतीं। ऐसे में यात्रियों को बस स्टैंड से 2–3 किमी अतिरिक्त सफर कर निजी साधन लेना पड़ता है। पक्षकारों को समय पर पेशी में देरी होने का खतरा बढ़ता है।
*बुजुर्ग, महिलाएँ और दिव्यांग यात्रियों को अधिक परेशानी*
उनियारा न्यायालय के स्थानीय अधिवक्ताओं का कहना है, “न्यायालय तक आसान पहुँच सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है; आदेश के बावजूद भी रोडवेज बसें कोर्ट के बाहर बस स्टॉप पर न रूकना गंभीर लापरवाही है।”
*प्रशासनिक जवाबदेही—कौन देगा जवाब?*
टोंक व सवाई माधोपुर डिपो प्रबंधन न्यायालय के आदेश की पालना में क्या रोडवेज ड्राईवर-परिचालकों को आदेश की पुनः ब्रीफिंग दी गई? कितनी बार रूट निरीक्षण/स्पॉट-चेक किए गए? निगम स्तर आदेश उल्लंघन पर कितनों के खिलाफ कार्रवाई हुई? स्टॉप पर सूचना पट्ट/घोषणा की व्यवस्था क्यों नहीं? जिला प्रशासन स्तर से कोर्ट के निर्देशों की अनुपालना की मॉनिटरिंग कौन कर रहा है?क्या समन्वय बैठक आयोजित हुई?
*न्यायिक प्रक्रिया पर असर*
कोर्ट में समयबद्ध उपस्थिति कई मामलों में अनिवार्य होती है। न्यायालय के बाहर निर्धारित बस स्टॉप पर बसों का न रूकने से सुनवाई टलने का जोखिम, गवाहों की अनुपस्थिति, आर्थिक व मानसिक दबाव, न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी। यह स्थिति न्याय तक समान पहुँच की अवधारणा पर सीधा सवाल खड़ा करती है।
*अपेक्षित कार्रवाई-सिर्फ आदेश नहीं, अमल भी*
– संयुक्त औचक निरीक्षण (निगम + प्रशासन)
– जीपीएस आधारित रूट मॉनिटरिंग
– स्टॉप पर स्पष्ट बोर्ड व अनाउंसमेंट
– उल्लंघन पर त्वरित अनुशासनात्मक कार्रवाई
– शिकायत हेतु सक्रिय हेल्पलाइन
*निष्कर्ष*
एक ओर न्यायालय के स्पष्ट निर्देश, दूसरी ओर क्रियान्वयन में ढिलाई, यह विरोधाभास प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आदेश कागजों तक सीमित रहेंगे या सड़क पर भी दिखाई देंगे?

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