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पालरा में ढोल की धमक, थाली की खनक के साथ गैर नृत्यः पीढ़ियों से चल रहा है लाल-सफेद- अंगी के साथ गैर नृत्य,सैकड़ो वर्षों से पीढ़ी दर पिढी नृत्य करते आ रहे है ग्रामीण

गुरलाँ/पालरा ( सत्यनारायण सेन ) । पालरा ग्राम पंचायत मुख्यालय पर देवनारायण मंदिर प्रागंण में गैर मेले में पालरा सहित आसपास के गांवो से सैकड़ों कलाकारों ने मनमोहक अंदाज में लाल-सफेद आंगी पहने हुए प्रस्तुतियां दी। इस गेर नृत्य को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे। यह नृत्य सामूहिक रूप से गोल घेरा करके ढोल, बांकिया, थाली आदि वाद्य यंत्रों के साथ हाथ में डंडा लेकर किया गया। इस नृत्य को देखकर लगता है मानों तलवारों से युद्ध चल रहा है। इस नृत्य की सारी प्रक्रियाएं और पद संचलन तलवार युद्ध जैसी लगती है। मेवाड़ के गैरिए नृत्यकार सफेद अंगरखी, धोती व सिर पर केसरिया, सफेद,पंचरंगी पगड़ी धारण करते है

पीढ़ी दर पीढ़ी खेलते है गैर नृत्य

स्थानीय बुजुर्ग के मुताबिक गैर नृत्य सदियों पुराना है और पीढ़ी-दर-पीढी खेलते आ रहे है। शनिवार को हुए गैर नृत्य दादा, बेटा, पौता एक साथ खेलते नजर आए। हमारे जैसे तीन पीढ़ियों वाले परिवार खूब एक साथ गैर नृत्य करते है। 40 सालों से गैर नृत्य करता हूं। पीढ़ी दर पीढी खेलते है। मेरे दादा, पिता खेलते थे। अब बेटा व पोता-पोती एक साथ खेलते है

ऐसे शुरू हुआ गैर नृत्य

स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब सैकड़ो वर्ष पहले किसान जब खेती-बाड़ी से फ्री हो जाते थे। महिलाएं लूर नृत्य (महिलाएं घेरा बनाकर करती है नृत्य) करती थी। तब महिलाओं की रक्षा के लिए पुरूष हाथ में डंडा लिए हुए होते थे। कुछ लोगों ने डंडा लिए नृत्य करना शुरू किया था। धीरे-धीरे इस नृत्य से लोग जुड़ते गए। अब यह परंपरा बन गई। इसके साथ आज हमारी कला-संस्कृति बन गई है। त्योहार में गैर नृत्य किया जाता है।

सैकड़ो सालों से चली आ रही परंपरा

कई दशकों से चला आ रहा गैर नृत्य इसमें गैरियों के पहनने वाली ड्रेस में कई रंगों के परिवर्तन हुए है, लेकिन परंपरा आज भी वही है। आधी सदी बीतने के बाद भी हमारी पीढ़ियां परंपराएं नहीं भूली है।

 

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