एजाज़ अहमद उस्मानी
स्मार्ट हलचल| मेड़ता रोड (राजस्थान) की पावन भूमि पर स्थित चमत्कारिक श्री फलवृद्धि पार्श्वनाथ जैन मंदिर में इन दिनों आध्यात्मिक वातावरण से ओत-प्रोत आराधना उपधान तप का पुण्य आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, दीक्षा, संयम और आत्मशुद्धि की गहन शिक्षा दी जा रही है।
इस पावन अवसर पर तपोरत्न महोदधि परमपूज्य आचार्यदेव श्रीमद् विजय हंसरत्नसूरीश्वरजी महाराजा एवं प्रवचन प्रभावक परमपूज्य आचार्यदेव श्रीमद् विजय तत्त्वदर्शनसूरीश्वरजी महाराज का दिव्य सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। उनके ओजस्वी प्रवचनों से श्रद्धालुओं में धर्म, तप और संयम के प्रति विशेष जागृति देखने को मिल रही है।
आचार्यश्री के मार्गदर्शन में उपधान तप की महिमा को सरल शब्दों में समझाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि—
“नवकार मंत्र का मिले अधिकार, उपधान तप की महिमा अपार।
मानव जीवन का एक ही सार, उपधान तप बिना नहीं उद्धार।”
जैन धर्म में मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य आत्मकल्याण माना गया है। जैन कुल में जन्म लेने के पश्चात नवकार महामंत्र का विधिपूर्वक अधिकार प्राप्त करना प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है। यह अधिकार पंचमंगल महाश्रुतस्कंध स्वरूप उपधान तप के माध्यम से ही प्राप्त होता है। उपधान तप को सामायिक धर्म की सर्वोत्तम आराधना कहा गया है, जो आत्मा को शुद्ध कर मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करती है।
श्री फलवृद्धि पार्श्वनाथ भगवान की छत्रछाया में तथा पूज्य गुरुदेवों के सान्निध्य में यह आध्यात्मिक उपधान तप पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ संपन्न कराया जा रहा है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेकर अपने जीवन को धर्ममय बना रहे हैं।
कार्यक्रम के दौरान यह प्रेरणादायक संदेश भी दिया जा रहा है कि—
“सोचते रहोगे तो पूरी जिंदगी बीत जाएगी, समय कभी अपने आप नहीं मिलेगा। हर समय निकालकर धर्म आराधना करनी चाहिए।”
पूज्य माताजी-पिताजी के शुभ आशीर्वाद तथा पावन पितृ दृष्टि से आयोजित यह उपधान तप श्रद्धालुओं के जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन लाने वाला सिद्ध हो रहा है। मेड़ता रोड की यह धर्मधरा एक बार फिर जैन संस्कृति और तप परंपरा की साक्षी बन रही













