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पूंजीवाद की पोषक धर्म एवं जाति आधारित पहचान की संकीर्ण राजनीति से दूर रहे छात्र-युवा-डॉ.बैरवा

पूंजीवाद की पोषक धर्म एवं जाति आधारित पहचान की संकीर्ण राजनीति से दूर रहे छात्र-युवा-डॉ.बैरवा

गंगापुर सिटी गंगापुर सिटी देश के छात्र एवं युवा जातिवादी एवं पूंजीवादी संकीर्ण विचारधारा की राजनीति से दूर रहे
यह विचार शिक्षा बचाओ आंदोलन के प्रदेश संयोजक एवं राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.रमेश बैरवा ने शाहजहांपुर बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन को प्रदेशभर से समर्थन देने पहुंचे एसएफआई कार्यकर्ताओं के छात्र संवाद कार्यक्रम में दिए अपने व्याख्यान में व्यक्त किए। साथ ही डॉ बैरवा ने आज एक बार फिर किसान आंदोलन स्थल शाहजहांपुर बॉर्डर पहुंचकर शिक्षा बचाओ आंदोलन की तरफ से सहयोग एवं समर्थन व्यक्त किया।

स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) द्वारा आयोजित छात्र संवाद में डॉ.रमेश बैरवा ने ‘जाति एवं धर्म आधारित पहचान की संकीर्ण राजनीति की चुनौतियाँ’ विषय पर विषय विशेषज्ञ के तौर पर व्याख्यान दिया। डॉ.बैरवा ने बताया कि पहचान की राजनीति भारत में ही नहीं दुनिया भर में राजनीति एवं राजनीतिक गतिविधियों की एक खास पहचान बन चुकी है।1960 के दशक तक तो पहचान की राजनीति की अवधारणा की बौद्धिक जगत में कोई में कोई चर्चा नहीं थी। असल में तो पहचान की राजनीति की सही से शुरुआत 1980 के दशक में हुई,जिसकी प्रमुख वजह 1980 के दशक में ही शुरू हुआ नवउदारवादी पूंजीवादी वैश्वीकरण था। वैश्विक पूंजीवाद ने इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर जहां एक ओर घोर आर्थिक विषमता पैदा की है,वहीं दूसरी और साझा संघर्ष की संभावना को कमजोर किया है।  1990 और उसके बाद पूर्व सोवियत संघ एवं पूर्वी यूरोप में समाजवाद को लगे वैचारिक झटके ने भी पहचान की राजनीति को बौद्धिक खुराक दी है। अमरीकी बुद्धिजीवी फ्रांसिस फुकुयामा के ‘एंड ऑफ हिस्ट्री’ के विचार के जरिये समाजवाद पर पूंजीवाद की विजय को अंतिम बताकर प्रचारित किया गया। पहचान की राजनीति का गहरा रिश्ता पोस्ट मोडर्ननिज़्म (उत्तर-आधुनिकतावाद) की बौद्धिक प्रवृत्ति से भी है। पोस्ट मोडर्ननिज़्म को पश्चिम के पूंजीवादी देशों की सरकारों ने बौद्धिक जगत में प्रोत्साहित किया ताकि तमाम किस्म के इंसानी जुल्म व ज्यादती से समग्र मुक्ति की पक्षधर क्रांतिकारी विचारधारा मार्क्सवाद एवं उदारवाद नवोदय को बौद्धिक रूप से कमजोर किया जा सके।

पोस्ट मोडर्ननिज़्म असल में समग्र यथार्थ को नहीं बल्कि खंडित यथार्थ को व्यक्त करता है। भारत में सबाल्टर्न,दलित, ट्राइबल,वीमेन स्टडीज़ की बौद्धिक प्रवृति के मूल में असल में पोस्ट मोडर्ननिज़्म ही है। पहचान की संकीर्ण राजनीति को जन्म देने एवं प्रचारित करने में पोस्ट मोडर्ननिज़्म की अहम भूमिका है। पहचान की राजनीति अपने स्वरूप में समावेशी नहीं,बल्कि संकीर्ण है। कट्टरता की भी पोषक है,जो अंततः जातिवाद एवं सांप्रदायिकता को ही बढ़ाती है। स्वतंत्रता, समानता,न्याय व लोकतंत्र के संवैधानिक मूल्यों के लिए चुनौती है पहचान की राजनीति। डॉ बैरवा ने आह्वान किया कि विषमता,भेदभाव,वैमनस्य एवं अन्याय से इंसान की समग्र मुक्ति के लिए प्रयासरत साझा आंदोलन के समर्थक छात्र,युवा एवं बुद्धिजीवियों को जाति व धर्म आधारित पहचान की संकीर्ण विचारधारा एवं राजनीति के प्रभाव से बचना चाहिए।

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