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यह उपदेश नहीं, हजारों वर्ष की परम्परा और गवर्नेंस का मॉडल है
✍️डॉ. नयन प्रकाश गांधी ,पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
स्मार्ट हलचल|प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब नई दिल्ली के ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में बोल रहे थे, तो सामने दुनिया के सबसे बड़े निवेशक, उद्योगपति और नीति निर्माता बैठे थे। यह फोरम पहली बार भारत में आयोजित हुआ था। ऐसे वैश्विक मंच पर प्रधानमंत्री ने जो बात कही, वह केवल एक भाषण नहीं थी, वह भारत की हजारों साल पुरानी सोच का आधुनिक अनुवाद था।उन्होंने कहा – पावर टू एंपावर करने वाला मानवीय भाव सिर्फ दूसरों को उपदेश देने के लिए नहीं है। यह हजारों वर्षों की परम्परा ने हमें सिखाया है, और भारत में हमने इसे अपनी गवर्नेंस और कार्य संस्कृति में लागू करके दिखाया है। यह एक पंक्ति भारत की पूरी विदेश नीति, आर्थिक नीति और सांस्कृतिक नीति का सार बन गई।
➡️ हर युग में पावर की परिभाषा बदली, पर भारत का भाव नहीं बदला
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि हर युग में शक्ति के स्रोत बदले हैं। कभी तलवार शक्ति थी, कभी जमीन शक्ति थी, कभी तेल शक्ति बना। लेकिन इक्कीसवीं सदी में, विशेषकर इस तीसरे दशक में, शक्ति की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है। आज टेक्नोलॉजी पावर है, डेटा पावर है, नॉलेज पावर है, इनोवेशन पावर है।लेकिन असली प्रश्न यह नहीं है कि यह पावर किसके पास है। असली प्रश्न यह है कि इस पावर का उपयोग कैसे हो रहा है। क्या टेक्नोलॉजी केवल कुछ लोगों को आगे ले जाएगी या करोड़ों लोगों के लिए नए अवसर बनाएगी? क्या ज्ञान केवल कुछ लोगों की ताकत बनकर रहेगा या सबकी क्षमता को बढ़ाएगा? क्या डेटा पर कुछ कंपनियों का कब्जा रहेगा या वह जन कल्याण का माध्यम बनेगा?यहीं से एक नए विचार का जन्म होता है और वह विचार है – पावर टू एंपावर।प्रधानमंत्री ने इसे तीन सूत्रों में समझाया। पहला – पावर टू कंट्रोल से आगे है पावर टू इनेबल। यानी नियंत्रण से आगे सक्षम बनाना। दूसरा – पावर टू कॉम्पिट से आगे है पावर टू कोलैबोरेट। यानी प्रतिस्पर्धा से आगे सहयोग। तीसरा – पावर टू सक्सीड से आगे है पावर टू हेल्प अदर्स सक्सीड। यानी खुद की सफलता से आगे दूसरों को सफल बनाना।
यह भारतीय दर्शन के मूल में है। वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः और अंत्योदय – ये केवल श्लोक नहीं, भारत की जीवन पद्धति रहे हैं।
➡️ भारत ने इसे गवर्नेंस में कैसे लागू किया – राजस्थान तक दिखता है असर
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह केवल उपदेश नहीं है, हमने इसे लागू किया है। और यह बात आंकड़ों में दिखती है।
पहला उदाहरण है डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का। भारत ने आधार, यूपीआई, कोविन जैसे प्लेटफॉर्म बनाए और उन्हें दुनिया के लिए खोल दिया। आज दुनिया जब डिजिटल आइडेंटिटी और डिजिटल पेमेंट का समाधान खोजती है, तो भारत के मॉडल की ओर देखती है। राजस्थान के कोटा के एक छोटे दुकानदार से लेकर जयपुर के एक स्टार्टअप तक, हर कोई यूपीआई से जुड़ा है। यह पावर टू इनेबल ही तो है। हमने टेक्नोलॉजी को कुछ लोगों के हाथ में नहीं रहने दिया, उसे गांव-ढाणी तक पहुंचाया।दूसरा उदाहरण है स्वास्थ्य क्षेत्र का। दुनिया की पांच में से एक जेनेरिक दवा भारत बनाता है। कोरोना काल में भारत ने वैक्सीन केवल अपने लिए नहीं बनाई, बल्कि सौ से अधिक देशों को भेजी। यह पावर टू हेल्प अदर्स सक्सीड का ही प्रमाण है।तीसरा उदाहरण है हर क्षेत्र में युवा प्रतिभा का परचम एवं हुनरमंद युवा उपलब्धता । आज दुनिया को जब हुनर की जरूरत होती है, तो वह भारत के युवाओं पर भरोसा करती है। देश में दो हजार से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स काम कर रहे हैं, जो दुनिया भर की कंपनियों को सेवाएं दे रहे हैं। यह सहयोग का मॉडल है, प्रतिस्पर्धा का नहीं।
राजस्थान के संदर्भ में देखें तो यही भाव यहां की कार्य संस्कृति में भी दिखता है। प्रदेश के स्वयं सहायता समूह, महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम, हर घर जल योजना – ये सब दूसरों को सक्षम बनाने के ही प्रयास हैं।
➡️ इस भाषण के पीछे तीन बड़े उद्देश्य :
इस भाषण के पीछे केवल दर्शन नहीं, रणनीति भी है। पहला उद्देश्य है – दुनिया में भरोसे के संकट के बीच भारत को एक स्थिर विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना। आज दुनिया युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा, व्यापारिक प्रतिबंध और क्रिटिकल मिनरल्स की कमी से जूझ रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने आंकड़ों के साथ कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत नींव पर खड़ी है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर, 700 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत बैंकिंग प्रणाली और दिवाला, श्रम और कराधान जैसे क्षेत्रों में सुधार – ये सब भारत को भरोसेमंद बनाते हैं।उन्होंने स्पष्ट कहा – वी डू नॉट ग्रो एट एनीवन्स कॉस्ट। वी ग्रो विद द वर्ल्ड एंड फॉर द वर्ल्ड। यानी हम किसी की कीमत पर नहीं बढ़ते, हम दुनिया के साथ और दुनिया के लिए बढ़ते हैं।दूसरा उद्देश्य है – भारत की मदर ऑफ डेमोक्रेसी वाली छवि को तकनीक के साथ जोड़ना। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में सौ से अधिक भाषाएं, अस्सी हजार से अधिक पंजीकृत अखबार, एक हजार से अधिक सैटेलाइट चैनल हैं। पचास करोड़ से अधिक यूट्यूब यूजर्स और पचास करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम यूजर्स अपने विचार खुलकर रखते हैं। यह डिजिटल पावर के कारण ही संभव हुआ है।तीसरा उद्देश्य है – निवेशकों को नया मंत्र देना। ब्लूमबर्ग फोरम निवेश का मंच है। वहां प्रधानमंत्री ने निवेशकों से कहा कि भारत में निवेश केवल मुनाफे का निवेश नहीं, बल्कि एक ऐसी अर्थव्यवस्था में निवेश है जो सबको साथ लेकर चलती है।
➡️ क्यों महत्वपूर्ण है यह विचार :दुनिया आज दो रास्तों पर खड़ी है। एक रास्ता वह है जो शक्ति को हथियार बनाता है, डेटा को हथियार बनाता है, टेक्नोलॉजी को हथियार बनाता है। दूसरा रास्ता भारत का है, जो शक्ति को सेवा का माध्यम बनाता है।
भारतवासी इस भाव को अच्छी तरह समझते हैं। हमारे यहां आज भी पड़ोसी के घर चूल्हा नहीं जले तो दूसरे घर से रोटी जाती है। यही पावर टू एंपावर है।
प्रधानमंत्री का यह विचार विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से भी जुड़ा है। विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक रूप से विकसित होना नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति बनाना है जो दूसरों को भी विकसित होने में मदद करे।
निष्कर्ष यही है कि पावर टू एंपावर केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की नई वैश्विक पहचान है। यह बताता है कि भारत अब दुनिया को नियंत्रित करने की होड़ में नहीं, बल्कि दुनिया को सक्षम बनाने के मिशन में लगा है। और यही कारण है कि आज दुनिया भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है।
📢लेखक परिचय – डॉ. नयन प्रकाश गांधी सामाजिक-राजनीतिक विषयों के विश्लेषक, लेखक और विचारक हैं। वे भारतीय संस्कृति और गवर्नेंस पर निरंतर लेखन करते हैं।