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प्रेम और मैत्री के आधार पर रामायण जबकि कलह से महाभारत की रचना होती हैं :- मुनि कुलदीप कुमार 

बागोर :- विष्णु विवेक शर्मा

भारतीय संस्कृति एक प्राणवान संस्कृति रही हैं । इस संस्कृति में समय समय पर महामति मूर्धन्य मनीषियों का अभ्युदय हुआ । जिन्होंने भारतीय मूल्यों की प्राण प्रतिष्ठा कर सम सामयिक समस्याओं का समीचीन समाधान प्रस्तुत किया । अगर हम भारतीय संस्कृति के उर्ध्वारौहण की मीमांसा करें तो परस्पर प्रेम, सौहार्द, सामंजस्य एवं सौंमनस्य के आधार पर ही इस संस्कृति ने समय के भाल पर सफलता के स्वस्तिक रचें हैं। वर्तमान परिपेक्ष में सौहार्द की कमी के कारण ही हम अनेक समस्याओं से गुजर रहे हैं । जहां प्रेम होता हैं वहां आदर्श रामायण की संरचना हो जाती हैं । और सामंजस्य के अभाव में कलह का महाभारत होते भी देरी नहीं लगती हैं । प्रेम और मैत्री के आधार पर ही हम विकास की नई संभावनाओं को उजागर कर सकते हैं ।
उपरोक्त विचार पीथास में बिराज रहे आचार्य महाश्रमण जी के विद्वान शिष्य बड़े मुनि कुलदीप कुमार ने श्रावक श्राविकाओं के समक्ष धर्मसभा में व्यक्त किये ।

-जब भी हमारा मन खिन्न हो, म्लान हो, दुःखित हो, पीड़ित हो, आहत हो, असहज हो, असंतुलित हो या फिर अव्यवस्थित हो हम अपने विचारों का शुद्धिकरण करना प्रारंभ कर दें। हमारे विचारों में वो शक्ति हैं वो ओषधि हैं जो हमें स्वस्थ्य एवं निरोगी कर सकती हैं । हमारे भीतर प्रसन्नता का नवसंचरण कर सकती हैं। पृथ्वी में आकर्षण हैं इस एक विचार नें “ग्रेविटेशन ऑफ ला” को जन्म दे दिया । विचारों की प्रखरता को जान कर उसे नई दिशा देने का प्रयत्न करें जिससे खुदबखुद स्वर्ग धरती पर उतर आएगा । ऊक्त विचार पीथास में बिराज रहे पीथास के जन्मेजाए मुनि मुकुल कुमार ने पीथास तेरापंथ जैन सभाभवन में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहें ।
तेरापंथ जैन समाज पीथास के मंत्री रतन लाल काल्या ने बताया कि आगामी महीने में आजूबाजू के विद्यालयों से बालक बालिकाओं को पीथास विद्यालय में बुलवाकर उनको मुनि कुलदीप कुमार व मुनि मुकुल कुमार अणुव्रत का पाठ पढ़ाएंगे ।

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