बूंदी- स्मार्ट हलचल|शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत निजी स्कूलों में मिलने वाले मुफ्त प्रवेश का सपना इस बार सैकड़ों गरीब परिवारों के लिए एक कठिन परीक्षा बन गया है। ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में बदलाव और दस्तावेज़ों की जांच का जिम्मा निजी स्कूलों को सौंपे जाने के बाद हालात ऐसे बन गए हैं कि छोटे-छोटे कारणों से बच्चों के आवेदन अटकाए जा रहे हैं। नतीजा—कई योग्य बच्चे दाखिले से वंचित रह गए हैं, और अभिभावक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
जानकारी के अनुसार, हर साल की तरह इस बार भी आरटीई के तहत प्रवेश प्रक्रिया ऑनलाइन माध्यम से शुरू की गई। लेकिन बड़ा बदलाव यह रहा कि पहले जहां आवेदन पत्रों की जांच शिक्षा विभाग करता था, वहीं इस बार यह जिम्मेदारी निजी स्कूलों को दे दी गई। यहीं से समस्याओं का सिलसिला शुरू हो गया। आरोप है कि कई स्कूलों ने बच्चों के दस्तावेजों में मामूली कमियां निकालकर उन्हें खारिज करना शुरू कर दिया, जिससे पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।
छोटी त्रुटियां, बड़ा नुकसान
मामले की पड़ताल में सामने आया कि कई बच्चों के आवेदन केवल तकनीकी या बेहद मामूली गलतियों के कारण रिजेक्ट कर दिए गए। कहीं नाम की स्पेलिंग में अंतर, तो कहीं दस्तावेज़ की स्कैन कॉपी स्पष्ट न होने जैसे कारणों को आधार बनाकर तो आय प्रमाण पत्र को लेकर भी स्कूलों ने आवेदन खारिज कर दिए। अभिभावकों का कहना है कि उन्हें इन त्रुटियों के बारे में समय रहते सही जानकारी नहीं मिल पाई, जिससे वे सुधार का मौका भी गंवा बैठे। हालांकि शिक्षा विभाग ने औपचारिक रूप से त्रुटियों में सुधार का मौका दिया और 9 अप्रैल तक पोर्टल भी खुला रखा, लेकिन इस राहत का लाभ बहुत कम अभिभावक उठा सके। ग्रामीण और गरीब तबके के कई अभिभावकों को यह तक पता नहीं चल पाया कि उनके बच्चों का आवेदन अधूरा या त्रुटिपूर्ण है।
अभिभावकों में आक्रोश, विभाग मौन, ऑफलाइन आवेदन स्वीकार की मांग
इस पूरे घटनाक्रम ने अभिभावकों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। उनका आरोप है कि आरटीई जैसी कल्याणकारी योजना, जिसका उद्देश्य गरीब बच्चों को बेहतर शिक्षा देना है, उसे निजी स्कूलों की मनमानी ने मजाक बनाकर रख दिया है। कई अभिभावकों ने बताया कि वे स्कूलों के चक्कर काटते रहे, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। वहीं, शिक्षा विभाग के अधिकारी इस मामले में स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं। जिम्मेदारी स्कूलों को सौंपने के फैसले पर अब सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी ने पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बना दिया है। अभिभावकों ने अब मुख्यमंत्री से ऑफलाइन आवेदन स्वीकार करने की मांग उठाई है। अभिभावकों का कहना है कि जिन अभिभावकों के आय प्रमाण पत्र, बच्चों के आधार ओर जन्म प्रमाण पत्र में कमियां सामने आई है और उनका आवेदन सबमिट नहीं किया गया है। ऐसे अभिभावकों के दस्तावेजों को शिक्षा विभाग द्वारा ऑफलाइन स्वीकार किए जाए।
नीति पर उठे सवाल
आरटीई कानून का मकसद समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है, लेकिन मौजूदा हालात इस उद्देश्य के विपरीत दिखाई दे रहे हैं। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह योजना अपने मूल उद्देश्य से भटक सकती है। फिलहाल जरूरत है कि शिक्षा विभाग इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करे, प्रभावित बच्चों को दोबारा मौका दे और प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाए। वरना ‘शिक्षा का अधिकार’ केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा, और गरीब बच्चों के सपने यूं ही अधूरे रह जाएंगे।
