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रमज़ानुल मुबारक: रहमत, मग़फिरत और बरकतों का अज़ीम महीना

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एजाज़ अहमद उस्मानी।

स्मार्ट हलचल|रमज़ानुल मुबारक इस्लामी साल का सबसे पवित्र, मुबारक और रहमतों से भरा महीना माना जाता है। यह महीना आत्मशुद्धि, इबादत, सब्र और इंसानियत की भावना को मजबूत करने का संदेश देता है। दुनिया भर के मुसलमान इस पूरे महीने रोज़ा रखकर, कुरआन की तिलावत कर, नमाज़ और दुआओं में मशगूल रहकर अल्लाह की रज़ा हासिल करने की कोशिश करते हैं। रमज़ान केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह इंसान के भीतर आध्यात्मिक जागृति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना जगाने का अवसर भी है।

*कुरआन के नुज़ूल का महीना*

इस्लामी मान्यता के अनुसार, इसी पवित्र महीने में कुरआन शरीफ का नुज़ूल हुआ। इसलिए रमज़ान को कुरआन का महीना भी कहा जाता है। मस्जिदों और घरों में विशेष रूप से कुरआन की तिलावत की जाती है। तरावीह की नमाज़ में हाफिज़-ए-कुरआन पूरे महीने में कुरआन मुकम्मल सुनाते हैं। यह माहौल ईमान और रूहानियत को और अधिक मजबूत बनाता है।

*मस्जिदों में इबादत की रौनक और तरावीह*

रमज़ान के चांद के दिखाई देते ही मस्जिदों में रौनक बढ़ जाती है। पांच वक्त की नमाज़ के अलावा ईशा की नमाज़ के बाद तरावीह अदा की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शरीक होते हैं। देर रात तक इबादत, ज़िक्र और दुआओं का सिलसिला जारी रहता है। लोग अपने गुनाहों की माफी, अपने परिवार की सलामती और पूरी इंसानियत की भलाई की दुआ करते हैं।रमज़ान के आखिरी दस दिनों को खास अहमियत दी जाती है। इन्हीं दिनों में शबे-क़द्र की तलाश की जाती है, जिसे हजार महीनों से बेहतर रात बताया गया है। इस दौरान इबादत का जुनून और भी बढ़ जाता है।

*रोज़ा: सब्र, तक़वा और बराबरी का पैग़ाम*

रोज़ा रमज़ान का सबसे अहम हिस्सा है। सेहरी से लेकर इफ्तार तक रोज़ेदार खाने-पीने से परहेज़ करते हैं और अपने आचरण को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। रोज़ा इंसान को सब्र और आत्मसंयम सिखाता है। यह भूख और प्यास का एहसास कराकर गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति हमदर्दी पैदा करता है।रोज़ा समाज में बराबरी का संदेश भी देता है। अमीर और गरीब सभी एक ही तरह से भूख-प्यास सहते हैं। इससे सामाजिक एकता और भाईचारा मजबूत होता है। रमज़ान का असली मकसद इंसान को बेहतर इंसान बनाना है।

*ज़कात, सदक़ा और सामाजिक जिम्मेदारी*

रमज़ान दान और खैरात का महीना भी है। इस दौरान मुसलमान ज़कात और सदक़ा अदा कर जरूरतमंदों की मदद करते हैं। ईद से पहले फितरा देना जरूरी माना गया है, ताकि गरीब लोग भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। यह परंपरा समाज में समानता और करुणा की भावना को मजबूत करती है।

*बाजारों में चहल-पहल और ईद की तैयारियां*

जैसे-जैसे रमज़ान अपने आखिरी दिनों की ओर बढ़ता है, बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। कपड़ों, जूतों, इत्र, टोपी, सेवइयों और खजूर की दुकानों पर भीड़ उमड़ने लगती है। महिलाएं घरों की साफ-सफाई और सजावट में जुट जाती हैं। बच्चे नए कपड़ों और ईदी के इंतजार में उत्साहित रहते हैं। हर तरफ खुशी और उत्साह का माहौल दिखाई देता है।

*इफ्तार की रौनक और भाईचारा*

इफ्तार का समय पूरे दिन की इबादत का खास लम्हा होता है। मस्जिदों और घरों में सामूहिक इफ्तार का आयोजन किया जाता है। खजूर और पानी से रोज़ा खोला जाता है, फिर तरह-तरह के पकवान परोसे जाते हैं। कई जगहों पर सामूहिक इफ्तार से भाईचारे और एकता का संदेश फैलता है।

*ईद: रोज़ेदारों के लिए अल्लाह का इनाम*

पूरे महीने की इबादत, रोज़ा और सब्र के बाद ईद का चांद दिखाई देता है और खुशियों की सौगात लेकर आता है। इस दिन को ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाता है। सुबह लोग नए कपड़े पहनकर ईदगाह और मस्जिदों में विशेष नमाज़ अदा करते हैं। नमाज़ के बाद गले मिलकर एक-दूसरे को मुबारकबाद दी जाती है।
घर-घर में मीठी सेवइयां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं। बच्चे ईदी पाकर खुश होते हैं। लोग रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाकर मुलाकात करते हैं। यह दिन आपसी मोहब्बत, भाईचारे और शुक्राने का प्रतीक होता है।

*आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश*

रमज़ान हमें यह सिखाता है कि असली कामयाबी दौलत या शोहरत में नहीं, बल्कि नेक अमल और इंसानियत में है। यह महीना आत्मचिंतन, आत्मसंयम और समाज सेवा का संदेश देता है। रमज़ान के जरिए इंसान अपने दिल को साफ करता है और एक नई शुरुआत की ओर कदम बढ़ाता है।
इस तरह रमज़ानुल मुबारक रहमतों, बरकतों और मग़फिरत का ऐसा महीना है, जो हर मुसलमान के लिए आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक एकता का अवसर लेकर आता है।

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