भीलवाड़ा, मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|व्यक्ति यदि अपने दोषों को छिपाकर दूसरों की कमियां खोजने में ही जीवन व्यतीत करता है तो वह आत्मकल्याण के मार्ग से भटक जाता है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के अवगुणों को पहचानकर उनका परित्याग नहीं करेगा, तब तक वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। यह प्रेरणादायी विचार अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने गुरुवार को आयोजित ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपने गुणों का बखान करता है और दूसरों के दोषों को उजागर करने में आनंद महसूस करता है। यही प्रवृत्ति उसे अपने से श्रेष्ठ व्यक्तियों में भी अवगुण दिखाई देने लगती है। उन्होंने कहा कि स्वयं को श्रेष्ठ मानना गलत नहीं है, लेकिन यह कहना कि “मैं ही श्रेष्ठ हूं” अहंकार और अज्ञान की पराकाष्ठा है। ऐसा भाव मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में किसी का राई के बराबर भी उपकार हो तो उसे पर्वत के समान मानकर जीवनभर उसका सम्मान करना चाहिए। माता-पिता, गुरु, वेद और शास्त्रों में दोष देखने वाला व्यक्ति कृतघ्न कहलाता है। उन्होंने कहा कि संसार में कृतघ्नता से बड़ा कोई पाप नहीं है, क्योंकि कृतघ्न व्यक्ति दूसरों के गुणों को स्वीकार नहीं करता और उपकार का भी अपकार कर देता है।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने वाला व्यक्ति ही परमात्मा के निकट पहुंच सकता है। उन्होंने विभिन्न दृष्टांतों के माध्यम से धर्म का सरल और प्रभावी संदेश देते हुए कहा कि “सिद्धांत आत्मा है और दृष्टांत उसका कलेवर।” बिना उदाहरण के किसी भी सिद्धांत को समझना कठिन होता है।
उन्होंने मनुष्य और पशुओं के व्यवहार की तुलना करते हुए कहा कि वानर, भालू सहित अनेक पशु-पक्षी इंसान का साथ निभाते हैं, लेकिन कई बार मनुष्य ही स्वार्थ और प्रलोभन में आकर विश्वासघात कर बैठता है। जबकि पशु कभी विश्वासघात नहीं करते। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में कृतज्ञता, विनम्रता और सेवा का भाव अपनाना चाहिए।
सत्संग से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। प्रवचन के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज की आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन सुबह 8:30 से 9 बजे तक रामधुनी के साथ वाणीजी का पाठ तथा सुबह 9 से 10 बजे तक दैनिक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। वहीं सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल कथा का भी आयोजन हो रहा है, जिसमें भीलवाड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रद्धाभाव से सहभागिता कर रहे हैं।
