टकराव के तनाव के बाद राहत का संघर्ष विराम (युद्ध से पहले बनाम युद्ध के बाद)

अनिश्चितता के नये दौर में टकराव थमा लेकिन अविश्वास कायम

(विवेक वैष्णव)

स्मार्ट हलचल|अमेरिका और इजराइल की सुरक्षा चिंताएं तथा ईरान की क्षेत्रीय भूमिका लंबे समय से विवाद का केंद्र रही हैं। बढ़ते तनाव ने न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाला बल्कि वैश्विक स्तर पर अस्थिरता की आशंकाएं भी पैदा कर दी थीं। पश्चिम एशिया में घटित हालिया घटनाक्रम के तहत अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने बीते दिनों वैश्विक चिंता को चरम पर पहुंचा दिया था। सैन्य गतिविधियों, कड़े बयानों और प्रतिशोध की आशंकाओं ने यह संकेत दे दिया था कि स्थिति किसी भी समय व्यापक संघर्ष का रूप ले सकती है।

प्रत्यक्ष या परोक्ष टकराव की आशंका ने ऊर्जा बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक को प्रभावित किया। तेल कीमतों में अस्थिरता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर प्रश्न और क्षेत्रीय देशों की चिंता ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह संघर्ष केवल सीमित भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति के लिए भी चुनौती है। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में संघर्ष विराम की दिशा में उठे महत्वपूर्ण कदम ने न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर राहत की भावना पैदा की है। यह विराम भले ही अस्थायी हो लेकिन इसने युद्ध की आशंकाओं को थामने का काम जरूर किया है।

जब हथियार शांत होते हैं तभी कूटनीति को अवसर मिलता है और संवाद के दरवाजे खुलते है। अमेरिका और ईरान बीच हालिया संघर्ष-विराम ने मध्य-पूर्व में तत्काल तनाव को भले ही कम किया हो लेकिन यह स्थायी शांति का संकेत नहीं बल्कि एक अस्थायी ठहराव भर है। टकराव के तनाव के बाद आया यह संघर्ष विराम उम्मीद की किरण लेकर जरूर आया है लेकिन इसे अंतिम समाधान मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चला आ रहा अविश्वास, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और सामरिक हितों का टकराव इस विराम को नाजुक बनाता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि यह कदम राहत तो देता है पर समाधान नहीं। यह केवल एक अवसर है, ‘‘भरोसा बनाने का, संवाद बढ़ाने का और स्थायी शांति की दिशा में ठोस कदम उठाने का’’।

मध्य-पूर्व में कई देश इस टकराव से सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। किसी भी सैन्य कार्रवाई से तनाव का दायरा बढ़ने की आशंका रहती है। स्थायी शांति के लिए बहुपक्षीय संवाद आवश्यक है। केवल द्विपक्षीय समझौते पर्याप्त नहीं होंगे बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे पर भी विचार करना होगा। सैन्य शक्ति के प्रदर्शन से अल्पकालिक दबाव तो बनाया जा सकता है लेकिन स्थायी समाधान संवाद से ही संभव है। यदि संघर्ष-विराम को आगे बढ़ाकर विश्वास निर्माण के उपाय जैसे संचार तंत्र, चरणबद्ध प्रतिबद्धताएं और पारदर्शिता आदि अपनाए जाते हैं तो यह ठहराव स्थायी शांति की दिशा में पहला कदम बन सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य टकराव ने वैश्विक राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। इस युद्ध ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कमजोरी को उजागर किया है। अपने चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वयं को ‘शांति के राष्ट्रपति’ के रूप में पेश किया था लेकिन ईरान के बुनियादी ढांचे पर हमले और ‘एक पूरी सभ्यता को मिटा देने’ जैसी धमकियों ने उनकी छवि को पूरी तरह बदल दिया है। ट्रम्प द्वारा मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों की अनदेखी ने अमेरिका की ’सॉफ्ट पावर’ को भारी नुकसान पहुँचाया है। वैश्विक मंच अब अमेरिका को एक भरोसेमंद सहयोगी के बजाय एक अनिश्चित और खतरनाक शक्ति के रूप में देख रही है।

युद्ध के दौरान अमेरिका-इजरायल के हमलों ने ईरान की दशकों पुरानी कूटनीति का मुख्य स्तंभ रहे उसके क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठन (हिजबुल्लाह, हमास, हूती) की सप्लाई चेन को काफी हद तक तोड़ दिया। युद्ध के दौरान खाड़ी देशों के साथ ईरान के संबंध और खराब हुए क्योंकि ईरान ने उन पर अमेरिकी हमलों में सहयोग करने का आरोप लगाया। पश्चिमी देशों से पूरी तरह कट जाने के बाद, ईरानी कूटनीति अब पूरी तरह ’’चीन और रूस’’ पर निर्भर हो गई है। ईरान ने कूटनीतिक समझौतों के लिए चीन को एक ’गारंटर’ के रूप में देखा। अब ईरान की कूटनीति केवल एक रक्षात्मक मोड में है जहाँ वह चीन और रूस के संरक्षण में खुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।

संघर्ष विराम के इस परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका और भी अहम हो जाती है। यदि वैश्विक शक्तियां संतुलित रुख अपनाते हुए शांति प्रक्रिया को मजबूत करें तो संघर्ष विराम को स्थायी शांति में बदला जा सकता है। पारदर्शी संवाद, मध्यस्थता और चरणबद्ध विश्वास निर्माण ही स्थायी समाधान का रास्ता खोल सकते हैं। यदि संयम, कूटनीति और विवेक को प्राथमिकता दी गई तो यह विराम पश्चिम एशिया में स्थिरता की नई शुरुआत साबित हो सकता है। स्थायी शांति के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति, निरंतर संवाद और पारस्परिक सम्मान आवश्यक हैं। यदि इन तत्वों को गंभीरता से अपनाया गया तो यह संघर्ष विराम इतिहास में केवल अस्थायी राहत नहीं, बल्कि स्थायी शांति की शुरुआत के रूप में दर्ज हो सकता है। इसके उलट यदि इस अवसर को गंवा दिया गया तो कोई अतिशयोक्ति नही कि तनाव फिर लौट सकता है। इतिहास गवाह रहा है कि कई बार संघर्ष विराम केवल अस्थायी राहत साबित हुए हैं क्योंकि मूल मुद्दों पर ठोस प्रगति नहीं हो पाई।

सबसे पहले, इस संघर्ष-विराम का महत्व इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हालिया टकराव ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका बढ़ा दी थी। तेल आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय गठबंधनों पर इसका असर पड़ना तय माना जा रहा था। संघर्ष विराम से तत्काल सैन्य टकराव का खतरा टला है जिससे वैश्विक बाजारों और कूटनीतिक प्रयासों को कुछ समय मिला है। यह समय दोनों पक्षों के लिए संवाद का अवसर बन सकता है बशर्ते वे इसे गंभीरता से लें। संघर्ष-विराम तभी टिकाऊ हो सकता है जब दोनों पक्ष सैन्य प्रतिक्रिया के बजाय राजनीतिक और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दें।

अंततः यह संघर्ष-विराम उम्मीद और आशंका दोनों का मिश्रण है। उम्मीद इसलिए है कि युद्ध की आंच फिलहाल थम गई है लेकिन आशंका इसलिए भी है कि मूल विवाद तो जस के तस हैं। अब जिम्मेदारी दोनों पक्षों पर है कि वे इस विराम को अवसर में बदलें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह ठहराव केवल अगले टकराव से पहले की खामोशी साबित हो सकता है। यह युद्ध विराम ट्रम्प के लिए एक ‘‘सामरिक जुआ’’ है। यदि यह शांति वार्ता सफल होती है और ईरान के साथ कोई नया समझौता होता है तो ट्रम्प इसे अपनी ‘बड़ी जीत’ के रूप में पेश करेंगे। लेकिन यदि तनाव फिर से बढ़ता है तो वे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ जाएंगे बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में आने वाला उछाल उनकी राजनीतिक स्थिति को संकट में डाल सकता है। दुनिया यह जान गई है कि ट्रंप के अधीन अमेरिका किसी भी क्षण युद्ध में उतर सकता है जिसके चलते छोटे राष्ट्र अब अमेरिका के बजाय चीन जैसे अधिक ‘‘स्थिर’’ देशों की ओर सुरक्षा के लिए देख रहे हैं।