अंतिम कार्य दिवस पर समय से पहले बंद मिला बांदोला का राजकीय प्राथमिक विद्यालय

 

मिड-डे मील नहीं बनने से बच्चों का हक भी छीना

अलकेश पारीक

जहाजपुर। स्मार्ट हलचल|शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत उजागर करती एक गंभीर घटना में आज सत्र के अंतिम कार्य दिवस पर राजकीय प्राथमिक विद्यालय, बांदोला निर्धारित समय से पहले बंद मिला। जब मीडिया टीम मौके पर पहुंची तो विद्यालय के कमरों पर ताले लटके हुए थे और परिसर पूरी तरह सुनसान नजर आया। न तो कोई शिक्षक मौजूद था और न ही किसी प्रकार की शैक्षणिक गतिविधि संचालित होती दिखाई दी।
स्थानीय ग्रामीणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आज विद्यालय में बच्चों के लिए बनने वाला मिड-डे मील (स्थानीय भाषा में ‘प्रसार’) भी तैयार नहीं किया गया। इससे न केवल बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई, बल्कि सरकार द्वारा संचालित पोषण योजना का लाभ भी विद्यार्थियों तक नहीं पहुंच सका। ग्रामीणों का कहना है कि यह सीधे तौर पर बच्चों के अधिकारों और सरकारी योजनाओं की अनदेखी है।
ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप
ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय में इस प्रकार की अनियमितताएं कोई नई बात नहीं हैं। उनका आरोप है कि:
विद्यालय कई बार समय से पहले बंद कर दिया जाता है।
मिड-डे मील नियमित रूप से नहीं बनता।
शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर लगातार शिकायतें रहती हैं।
बार-बार शिकायतों के बावजूद संबंधित अधिकारी प्रभावी कार्रवाई नहीं करते।
ग्रामीणों ने बताया कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों को पूर्व में भी इस संबंध में अवगत कराया गया, लेकिन अब तक स्थिति में कोई ठोस सुधार देखने को नहीं मिला।
शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल
सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और बच्चों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद यदि अंतिम कार्य दिवस पर विद्यालय बंद मिले और बच्चों के लिए भोजन तक न बनाया जाए, तो यह शिक्षा तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
जांच और कठोर कार्रवाई की मांग
स्थानीय अभिभावकों और ग्रामीणों ने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी जहाजपुर, जिला शिक्षा अधिकारी भीलवाड़ा और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि मामले की तत्काल जांच कराई जाए तथा दोषी पाए जाने वाले शिक्षकों और जिम्मेदार कार्मिकों के विरुद्ध सख्त विभागीय कार्रवाई की जाए।
बड़ा सवाल
जब बच्चों की पढ़ाई और पोषण दोनों से समझौता किया जा रहा हो, और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न हो, तो आखिर जिम्मेदार कौन है?
अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं